हुसैन की कहानी अपनी ज़बानी – बड़ौदा का बोर्डिंग स्कूल – कवि परिचय
‘बड़ौदा का बोरिंग स्कूल’ ‘मकबूल फ़िदा हुसैन’ लिखित संस्मरण है। दादा के मरने के बाद मकबूल चुप रहने लगा था। वह अब बड़ा अपनी उम्र से लगने लगा था। उसे अपने दादा से बहुत प्यार था। उसकी गुम-सुम रहनेवाली स्थिति देखकर उसके पिता ने उसे बड़ौदा के बोडिंग स्कूल में भेज दिया। वहाँ पढ़ाई के साथ मजहबी शिक्षा भी दी जाती थी। बड़ौदा शहर महाराजा सियाजीराव गायकवाड़ का था। उस समय इस शहर की एक खास बात यह थी कि यहाँ का राजा मराठा था और प्रजा गुजराती थी। Xpassbook.blogspot.com
बड़ौदा का बोडिंग स्कूल गांधी जी के अनुयायी जी० एम० हकीम अब्बास तैयबजी की देख-रेख में चलता था। गांधी-भक्त होने के कारण वे छात्रों के सिर मुँड़वाकर सिर पर गांधी टोपी और बदन पर खादी का कुरता-पायजामा पहनने के लिए देते थे। यहाँ मकबूल की दोस्ती छह लड़कों से हुई है। ये सब लड़के दिल से एक-दूसरे के बहुत करीब आ गए थे और ये नजदीकियाँ कभी भी दूर रहते हुए भी कम न ही हो पाई थी। स्कूल के वार्षिक समारोह में खास मेहमानों और उस्तादों की गुप फोटोग्राफ़ खींचे जा रहे थे। उन फोटो में मकबूल भी अवसर देखकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा लेता था।
मकबूल ने स्कूल में हाई जंप में प्रथम स्थान प्राप्त किया परंतु दौड़ में फिसड्डी रहा। ड्राइंग मास्टर ने ब्लैक बोई पर चिड़िया बनाई और सब बच्चों को उसे देखकर बनाने के लिए कहा। मकबूल ने स्लेट पर बिलकुल वैसी ही चिड़िया बनाई जैसी मास्टर ने बनाई थी। उसे इसमें दस में से दस अंक मिले। दो अक्तूबर को मकबूल ने समारोह आरंभ होने से पहले गांधी जी का पोट्रेट ब्लैक-बोर्ड पर बनाया जिसे देखकर अब्बास तैयब जी खुश हुए। स्कूल के समारोह में बोलने के लिए मौलवी अकबर ने मकबूल को ‘इलम’ पर दस मिनट का भाषण तैयार करवाया। उस भाषण के अनुसार जिसके पास कोई हुनर नहीं है वह दुनिया का चहेता होते हुए भी लोगों के दिलों को जीत नहीं सकता।
उस समय किसी को भी यह नहीं पता था कि यह लड़का बड़ा होकर सारी दुनिया में अपना कमाल फैलाएगा। मकबूल के चाचा मुरादअली को रानीपुर बाजार में मकबूल के पिता ने एक जनरल स्टोर की दुकान खुलवा दी। फ़िदा साहब स्वयं ‘मालवा टेक्सटाइल’ में चौकीदार थे परंतु उनकी बिजनेस में दिलचस्पी थी। छुद्टी के दिन वह मकबूल को दुकान पर व्यापार के गुर सीखने के लिए भेजते थे। उन्होंने अपने भाई मुरादअली के लिए एक काम न चलने पर दूसरा काम खुलवा कर दिया। मकबूल को भी उन दुकानों पर साथ बैठाया गया, परंतु उसका सारा ध्यान ड्राइंग और पेंटिंग में लगा रहता था। Xpassbook.blogspot.com
उसे दुकान की चीजों के मूल्य-भाव याद नहीं रहते थे, परंतु वह गल्ले का हिसाब-किताब सही रखता था। बहियों में ही वह स्केच बनाता रहता। जनरल स्टोर पर बैठकर आगे से गुज़रनेवाले लोगों के मकयूल तरह-तरह के स्केच बनाता। एक मेहतरानी (नौकरानी) अकसर दुकान से सामान लेकर जाती थी। उसने उसके कई तरह के स्केच बना दिए थे। वह समय साइलेंट फिल्मों का था। उस समय फ़िल्मों के इशितहार रंगीन पतंग के कागज़ पर हीरो-हीरोइन की तसवीरों के साथ छापे और बँटट जाते थे। मकबूल ने कोल्हापुर के शांताराम की फ़िल्म ‘सिंहगढ़’ का पोस्टर देखा। रंगीन कागज़ की पतंग पर एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में ढाल लेकर एक मराठा योद्धा खड़ा था।
मकबूल ने उस पोस्टर की ऑंयल पेंटिंग बनानी चाही। मकबूल के पिता उसे बिजनेसमैन बनाने का सपना देखे हुए थे, इसलिए उन्होंने उसे ऑयल कलर नहीं दिलवाए। मकबूल ने अपनी चाहत पूरी करने के लिए अपनी स्कूल की दो किताबें बेच दीं और ऑयल कलर की ट्यूब खरीदकर चाचा की दुकान पर बैठकर पहली ऑयल पेंटिंग बनाई। चाचा ने पिता से इस बात की शिकायत कर दी। पिता ने पेंटिंग देखकर पुत्र को अपने गले लगा लिया।
मकबूल इंदौर के सर्राफ़ा बाज़ार के करीब ताँबे-पीतल की दुकानों की गली में लँंडस्केप बना रहा था। वहाँ उसकी मुलाकात बंंद्रे साहब से हुई। वे ऑन स्पॉटट पेंटंग करते थे, उसे उनकी यह तकनीक अच्छी लगी। इस मुलाकात के बाद अकसर वह बेंद्रे के साथ लँडस्केप पेंट करने जाया करता था। 1933 में बेंद्रे ने कैनवास पर एक पेंटिंग शुरू की; उसमें अपने भाई को पठान के रूप में मॉंडल बनाया। उस पेंटिंग में फ्रेंच इंग्रेशन की झलक थी। उस पेंटिंग को ‘बंबई आर्ट सोसायटी’ ने बेंद्रे को चाँदी का मेडल दिया।
हिंदुस्तानी मॉडर्न आर्ट में शायद यह पहला क्रांतिकारी कदम था। इस पेटिंग में जोश की सुर्खी कम जवानी का गुलाबीपन ज्यादा था। राजा रवि वर्मां और गजेंद्रनाथ टैगोर ने भी पेंटिंग में अपने तज़ुर्ब किए। वे ज्यादा दर तक आर्ट की दुनिया में टिके नहीं रहे। बेंद्र के गुलाबीपन ने कुछ समय तक अपना प्रभाव बनाए रखा। उन्हें बड़ौदा के ‘फ़ैकल्टी ऑफफ फ़ाइन आर्ट’ का डीन बना दिया गया। Xpassbook.blogspot.com
मकबूल ने पेंटिंग की शुरुआत इंदौर जैसी जगह में बेंदे के घर से की। एक दिन बेंद्रे ने मकबूल के पिता से मिलकर उनके काम की बात की। बेंद्रे की बात सुनकर उसके पिता ने अगले दिन बंबई से ‘विनसर न्यूटन’ ऑयल द्यूब मँगवाने का ऑर्डर दे दिया। उन दिनों पेंटर बनने की सोचना आश्चर्य की बात थी। मकबूल के पिता ने सारी मान्यताओं को नज़रअंदाज़ करके अपने बेटे को जिंदगी में रंग भरने की इज्ञाज़त दे दी।
कठिन शब्दों के अर्थ :
चल बसे – मर गए
अब्बा – पिता
गुमसुम – खोया-खोया, चुपचाप रहना
हवाले – सुपुर्द
आचरण – चालचलन
सबक – पाठ
पाकीज़मी – पवित्रता
जमात – श्रेणी
अनुयायी – मानने वाले
उस्ताद – गुरु, विद्वान
सालन – सब्ज़ी
तमाम – सारी Xpassbook.blogspot.com
मुश्क – सुगंध
खास – विशेष
हूबहू – बिलकुल वैसी, ज्यों की त्यों
सालगिरह – वर्षगाँठ
पोट्टेट – रेखाचित्र
इलम – ज्ञान
बाकायदा – नियम के अनुसार
हुनर – कला, गुण
कमाल – कुशलता, निपुणता
हासिल – प्राप्त
बिज्ञनेस – व्यापार
दिलचस्पी – रुचि
कैदे बामशक्कत – परिश्रम के साथ सज्जा काटना
सिज़़े – नमस्कार करना, माथा टेकना
लैंडस्केप – प्राकृतिक दृश्य
ऑनस्प्पॉट पेंटिग – स्थान पर चित्र बनाना
टेकनीक – तरीका, ढंग
इत्तफ़ाकी – अचानक
रियलिज्म – यथार्थवाद
एक्सप्रेशनिस्ट – सुविवेचित
बंदिशों – बंधनों
तज़ुर्बें – अनुभव
अर्सें – समय
हर दिल अजीज़ – सर्वप्रिय
ताज्जुब – हैरानी
माहौल – वातावरण Xpassbook.blogspot.com
इख्तियार – वश, काबू
शगल – शौक
अख्याश – बिलासी
रोशनख़याली – विचारों की आज़ादी
नज़्रअंदाज – अनदेखा करना
मशवरे – सलाह
तमाम – सारी
रिवायती – परंपराएँ Xpassbook.blogspot.com
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