नए की जन्म कुंडली : एक – ओमप्रकाश वाल्मीकि – कवि परिचय
जीवन-परिचय – गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ का जन्म 13 नवंबर, 1917 को श्योपुर में ग्वालियर के निकट हुआ था। आपके पिता पुलिस विभाग में इंस्पेक्टर थे और उनका तबादला प्राय: होता रहता था। बालक मुक्तिबोध की शिक्षा में इस कारण बाधा पड़ती रही थी। सन 1930 में मुक्तिबोध ने मिडिल की परीक्षा उज्जैन से दी और अनुत्तीर्ण हो गए। कवि ने इस असफलता को अपने जीवन की महत्वपूर्ण घटना स्वीकार किया है। इसके पश्चात पढ़ाई का सिलसिला ठीक ढंग से चला और साथ ही जीवन के प्रति उनकी नई संवेदना और जागरूकता बढ़ने लगी। माधव कॉलेज, उज्जैन में पढ़ते हुए सन 1935 में इन्होंने साहित्य रचना का कार्य प्रारंभ किया। 1939 में आपने शांता जी से प्रेम-विवाह कर लिया।
मुक्तिबोध ने छोटी आयु में ही बड़नगर के मिडिल स्कूल में अध्यापन कार्य प्रारंभ किया। इसके पश्चात शुजालपुर, उज्जैन, कोलकाता, इंदौर, मुंबर्, वैंगलुरु तथा बनारस आदि स्थानों पर नौकरियाँ कीं। लेखक के अनुसार, “नौकरियां पकड़ता और छोड़ता रहा। शिक्षक, पत्रकार, पुन: शिक्षक, सरकारी और गैर-सरकारी नौकरियाँ। निम्न मध्यवर्गीय जीवन बाल-बच्चे, दवा-दारु, जन्म-मृत्यु में उलझा रहा।” मुक्तिबोध ने मध्य प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड के लिए ‘भारत का इतिहास और संस्कृति’ पुस्तक लिखी और मँजूरी भी मिल गई।
परंतु शीघ्र ही कुछ लोगों के दबाव के कारण पुस्तक पर न्यायालय ने रोक लगा दी। अपनी पुस्तक पर प्रतिबंध लगने की घटना को मुक्तिबोध ने दूसरी महत्वपूर्ण घटना स्वीकार किया है। 1958 में आपको दिग्विजय महाविद्यालय, राजनंदगाँव में प्राध्यापक की नौकरी मिल गई। मुक्तिबोध की रुचि अध्ययन-अध्यापन, पत्रकारिता और समसामयिक, राजनीतिक एवं साहित्यिक विषयों पर लेखन में थी। 1942 के आसपास वे वामपंथी विचारधारा की ओर झुके तथा शुजालपुर में रहते हुए उनकी वामपंथी चेतना सुदुढ़ हुई। आजीवन निर्धनता से लड़ते और रोगों का मुकाबला करते हुए 11 सितंबर, 1964 को आपका देहांत हो गया।
रचनाएँ – ‘मुक्तिबोध’ की ख्याति सन 1943 में प्रकाशित ‘तार-सप्तक’ से फैली जिसका संपादन अज्ञेय ने किया था। इस संग्रह से मुक्तिबोध प्रयोगवादी कवि के रूप में स्थापित हुए। इसी समय उसका झुकाव वामपंथ की ओर हो चला था और वे मार्क्सवादी दर्शन से प्रभावित होने लगे थे। आपकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं –
काव्य संग्रह – चाँद का मुँह टेढ़ा है, भूरी-भूरी खाक धूल।
कथा साहित्य – काठ का सपना, विपात्र, सतह से उठता आदमी।
आलोचना-कामायनी : एक पुनर्विचार, नई कविता का आत्म-संघर्ष, नए साहित्य का साँदर्य-शास्त्र, समीक्षा की समस्याएँ एक साहित्यिक की डायरी।
संस्कृति और इतिहास-भारत : इतिहास और संस्कृति।
मुक्तिबोध का समस्त साहित्य राजकल प्रकाशन द्वारा ‘मुक्तिबोध रचनावली’ के रूप में छः खंडों में प्रकाशित हो चुका है।
भाषा-शैली – मुक्तिबोध ने अपने निबंध ‘नए की जन्म कुंडली : एक’ में यह स्पष्ट किया है कि समाज में आने वाले नए परिवर्तनों को व्यावहारिकता में पूर्णरूप से न अपनाने के कारण हम पुराने को तो छोड़ देते हैं-परंतु नए को भी वास्तविक रूप में अपना नहीं पाते हैं। लेखक ने अपनी भावनाओं को अत्यंत ही सहज, तत्सम-प्रधान भाषा तथा आत्मकथात्मक शैली में रोचकता से प्रस्तुत किया है। लेखक ने मेधावी, अनुभूति, आंतरिक, स्पर्श, सूक्ष्म, निजत्व, जर्जर, यर्शस्विता जैसे तत्सम प्रधान शब्दों के साथ ही ऐड़ा-बेड़ा, कड़ी, नामी-गिरामी, कतई, मुलाकात, चमचमाते, रोमांस, रोमेंटिक, चिमटी, जिंदगी, चौखटा जैसे देशज तथा विदेशी शब्दों का भी भरपूर प्रयोग किया है।
बाल सफ़ेद होना, अड़ा रहना, दो ध्रुवों का भेद, झपट्टा मारना जैसे मुहावरों के प्रयोग से लेखक के कथन में लाक्षणिकता एवं प्रतीकात्मकता का समावेश हो गया है। लेखक का कवि हृदय भी कुछ स्थलों पर मुखरित हो गया है, जैसे-“सामने पीपल का वृक्ष है। चाँदनी में उसके पत्ते चमचमाते काँप रहे हैं। चाँदनी और उसमें चित्रित छायाएँ हमारे मनोलोक को एक नई दिशा दे रही हैं।” लेखक ने इस निंबध में वर्तमान और अतीत से जूझती भारतीय जन-जीवन की मानसिकता का यथार्थ अंकन इस निबंध में अत्यंत कुशलतापूर्वक किया है।
Naye Ki Janam Kundali Ek Class 11 Hindi Summary
‘नए की जन्म कुंडली : एक’ गजानन माधव मुक्तिबोध द्वारा रचित एक विचार-प्रधान निबंध है, इसमें लेखक ने वर्तमान युग में होने वाले सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं साहित्यिक परिवर्तनों को व्यावहारिकता में न अपनाने के कारण होने वाली विसंगतियों पर चर्चा की है। लेखक का एक मित्र है, जिसे वह बहुत बुद्धिमान समझता था और उसे आशा थी कि वह एक दिन अवश्य ही प्रतिभाशाली व्यक्ति बनेगा। बारह वर्षों बाद जब लेखक की अचानक उससे मुलाकात होती है तो उसे लगता है कि अब तो वह स्वयं भी बुद्धिमान हो गया है। उसके और उसके मित्र की दिशाएँ भी बदल गई हैं। उसके मित्र के बाल सफेद हो गए थे।
उसका मित्र काव्य और गणित नहीं समझ पाता था। लेखक को अपने मित्र के बीच आई हुई दूरी खटकती भी थी और अच्छी भी लगती थी। खटकती इसलिए थी कि मित्रों के बीच दूरी नहीं होनी चाहिए और अच्छी इसलिए लगती थी कि यह दूरी उनकी गति को चुनौती दे रही है।
लेखक को इस बात की खुशी थी कि वह अपने इस मित्र को पूरी तरह से भूल चुका था, क्योंकि उसका मित्र एक जिद्दी स्वभाव का व्यक्ति था। उसने राजनीति को अपना लिया था। लेखक को उसका राजनीति में उतरना अपने उत्तरदायित्वों से भागना लगा था। राजनीति के साथ वह साहित्य रचना भी करने लगा तो लेखक को कुछ अच्छा लगा, किंतु तब तक उसकी हालत बिगड़ गई थी। इस प्रकार दोनों एक-दूसरे से दूर होते चले गए। आज लेखक को लगता है कि सांसारिक समझौतों ने ही उसके मित्र के व्यक्तित्व को असामान्य बना दिया था।
लेखक सामान्य व्यक्ति उसे मानता है जो अपने भीतर के असामान्य के उग्र आदेशों को न मानने की सामर्थ्य रखता हो। जब उसका मित्र सदा उसके भीतर के असामान्य को उकसा देता था, तब वह स्वयं को बहुत हीन अनुभव करने लगता था।
लेखक के सोचने-समझने और कार्य करने की अपनी शैली थी। वह सब कार्य यह सोचकर करता था कि उसके कार्यों से लोग प्रसन्न होते हैं जबकि उसका मित्र कोई भी कार्य इसलिए करता था क्योंकि उस वह कार्य ढंग से कर देना होता है। यही दोनों में दो ध्रुवों का भेद था। लेखक जीवन में सफल हो गया तथा उसका मित्र असफल रहा। लेखक के मित्र को अपने असफल होने की कोई चिता नहीं थी।
अब जब इतने वर्षों बाद मित्र उसे मिला है तो उसे ऐसा लग रहा है जैसे वह किसी उल्का-पिंड की तरह है जो सैकड़ों वर्षों से सूर्य के पास चक्कर लगाते हुए भटक गया था और अब सही मार्ग पर आ गया है। वह अपनी ज़िदगी को भूल का नक्शा कहता है, जो जीवन में छोटी-छोटी सफलताएँ चाहता था पर उसे मिली सिफ़ एक भव्य असफलता। लेखक ने उसे यह कहकर सांत्वना देने का प्रयास किया कि उसके पास तो नक्शा ही नहीं है, न गलत और न सही।
लेखक अपने मित्र से डर-डर कर बातें कर रहा था। वह उसे किसी प्रकार की चोट नहीं पहुँचाना चाहता था। वह चुपचाप उसकी बातें सुन रहा था और आवश्यकता होने पर मुस्कराकर अपनी बात कर देता था। लेखक ने उससे पूछा कि पिछले बीस वर्षों की सब से महान घटना क्या है। इस पर उसने उत्तर दिया कि संयुक्त परिवारों का विघटन होना। लेखक उसका उत्तर सुनकर स्तब्ध रह गया। उसने लेखक को बताया कि इसका साहित्य से भी गहरा संबंध है। वातावरण में चाँदनी की रहस्यमय मधुरता और ठंडा एकांत था। लेखक अपने मित्र का उत्तर सुनकर अपने पड़ोसियों और परिचितों के संबंध में सोचने लगा तो बेचैन हो उठा। उसे लगा कि उसके मित्र का कथन सही है। ज़िंदगी और जमाना बदलता जा रहा है, पर हम इसे पचा नहीं पा रहे।
लेखक ने फिर उससे पूछा कि इन वर्षों में सबसे बड़ी भूल कौन-सी हुई है ? उसका जवाब था कि राजनीति और साहित्य के पास समाजसुधार का कोई कार्यक्रम न होना सबसे बड़ी भूल है। आजादी के बाद जातिवाद का उदय इसी का दुष्परिणाम है। लेखक को मित्र का यह कथन हास्यास्पद लग रहा था। वह लेखक को अविश्वास से देख रहा था। चाँदनी रात में सेमल के झाड़ पर बैठे कुछ कौवे चौँक पड़े थे। मित्र ने लेखक को कहा कि आज समाज में वर्ग-भेद है, परंतु राजनीति और साहित्य के पास कोई ऐसी योजना नहीं है कि समाज की बुनियादी इकाई परिवार के लिए कुछ कर सके।
परिवार ही हमारे चरित्र का विकास करता है और वहीं से हमें सांस्कृतिक शिक्षा मिलती है। समय के साथ-साथ संयुक्त सामंती परिवारों का विषटन हुआ और उन विचारों और संस्कारों के प्रति विद्रोह भी हुआ, जो इन परिवारों में पाए जाते थे। इसके बाद विद्रोह राजनीति के बाहर तो होने लगा, पर घर में नहीं। इस प्रकार संघर्ष को टाल दिया गया। अब भी हमारे परिवारों में पुराने सामंती अवशेष पल रहे हैं। सर्वत्र एक अवसरवादी दृष्टिकोण अपनाया जाता है। कोई कुछ नया नहीं खोजना चाहता। Xpassbook.blogspot.com
जो पुराना है वह लौट कर तो नहीं आ सकता, परंतु नया भी पुराने का स्थान नहीं ले पा रहा है। धर्म-भावना गई, परंतु वैज्ञानिक बुद्धि भी नहीं आई है। धर्म हमारे जीवन के प्रत्येक पक्ष को अनुशासित करता था। नए वैज्ञानिक मानवीय दर्शन ने ‘नया’ तो दिया, परंतु उस ‘नए’ को हम नहीं जान सके, क्योंकि नए मान-मूल्य, नया इनसान परिभाषाहीन और निराकार हो गए हैं। इन्होंने नए जीवन और अनुशासन का रूप धारण नहीं किया है और ये धर्म और दर्शान का स्थान भी नहीं ले सके हैं।
कठिन शब्दों के अर्थ :
मेधावी – बुद्धिमान
भान – आभास
विचित्र – अनोखा
आंतरिक – भीतरी
साक्षात् – प्रत्यक्ष, आँखों के सामने
शिकंजा – जकड़
मस्तिष्क-तंतुओं – मस्तिष्क की शिराएँ
रोमैंटिक कल्पना – ऐसी कल्पना जिनमें प्रेम और रोमांच हो
भूतपूर्व – पहले का
मर्म – रहस्य
‘ओड टु वेस्ट विंड’ – अंग्रेजी कवि शैले की रचना
स्क्वेअर रुट ऑफ़ माइनस वन – गणित का एक सूत्र
बावजूद – के अतिरिक्त, अलावा
अभिधार्थ – शब्द का वाच्यार्थ
ध्वन्यार्थ – वह अर्थ जिसका बोध व्यंजनावृत्ति से होता है
व्यंग्यार्थ – व्यंजना शब्द शक्ति से प्राप्त अर्थ, सांकेतिक अर्थ
कतई – बिलकुल
आच्छन्न – छिपा हुआ, ढका हुआ
असाधारणता – विशेषता, जो साधारण न हो
कुर्बान – न्योछावर
क्रूरता – हृद्य की कठोरता
निर्दयता – क्रूरता, दया का न होना
बरदाश्त – सहन
भीषण – कठिन
उत्तरदायित्व – ज़िम्मेदारी
पलायन – भावना
वहन – उठाना
प्रवृत्ति – स्वभाव
जर्जर – ट्रा-फूटा
विनाशक – विनाश करने वाली
हुदयभेदक प्रक्रिया – हुदय को भीतर तक प्रभावित करने वाली क्रिया
निजत्व – अपनापन
ऐंड़ा-वेंड़ा – टेढ़ा-मेढ़ा
नामी-गिरामी – प्रसिद्ध
इंटीग्रल (अंग्रेजीवाद) – अभिन्न
आत्मप्रकटीकरण – अपने मन की वास्तविकता प्रकट करना, मन की बात कहना
यशस्विता – प्रतिष्ठा, अत्यधिक यश, प्रसिद्धि
धुव – केंट्र, छोर
उल्कापिंड – लौहमिश्रित पत्थर के टुकड़े जो अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं
अप्रत्याशित – जिसकी आशा न हो, उम्मीद के विपरी
खरब – भारतीय गणना में सौ अरब की संख्या
हास – पतन
अनिच्छित – बिना इच्छा के, अनचाहा
इम्तिहान – परीक्षा
वस्तुस्थिति – वास्तविक स्थिति
अप्रत्यक्ष – जो दिखाई न दे, परोक्ष
जातिवाद – जाति-विशेष को श्रेष्ठ बताने या जाति-विशेष का पक्ष लेने की प्रवृत्ति।
अवशेष – बचा हुआ।
सप्रश्नता – प्रश्न के साथ, जिसके साथ प्रश्न जुड़ा हुआ हो
अवलंबन – सहारा, आश्रय।
सर्वतोमुखी – सभी ओर से, सभी दिशाओं में
नए की जन्म कुंडली : एक सप्रसंग व्याख्या
1. वह अपने विचारों या भावों को केवल प्रकट ही नहीं करता था, बल्कि उन्हें स्पर्श करता था, सूँघता था, उनका आकार-प्रकार, रंग-रूप और गति बता सकता था, मानो उसके सामने वे प्रकट साक्षात और जीवंत हों। उसका दिमाग लोहे का एक शिकंजा था या सुनार की एक छोटी-सी चिमटी, जो बारीक-से-बारीक और बड़ी-से-बड़ी बात को सूक्ष्म रूप से और मजबूती से पकड़कर सामने रख देती है।
प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ गजानन माधव मुक्तिबोध द्वारा रचित निबंध ‘नए की जन्म कुंडली : एक’ से ली गई हैं। इस निबंध में लेखक ने नए और पुराने के संघर्ष में टूटते हुए संयुक्त परिवारों, सांस्कृतिक मूल्यों तथा सामाजिक संरचना पर विचार किया है।
व्याख्या – इन पंक्तियों में लेखक अपने उस मित्र की प्रशंसा कर रहा है जिसने सारा जीवन अभाव में व्यतीत करते हुए भी अपने सिद्धांतों को नहीं त्यागा लेखक के अनुसार उसका मित्र अपनी भावनाओं तथा विचारों को पूरी ईमानदारी से व्यक्त करता था। अपने विचारों को प्रकट करने से पूर्व वह उन पर गंभीरता से मनन करता था। उसकी अभिव्यक्ति से ऐसा प्रतीत होता था, मानो उसने उन विचारों को स्वयं प्रत्यक्ष रूप में हुआ है, सूँघा है, देखा है। उनका आकार-प्रकार उसके सामने सजीव रूप धारण किए हुए प्रतीत होता था। उसका दिमाग ऐसा तेज था जैसे कोई पकड़ने वाली वस्तु हो अथवा सुनार की छोटी-सी चिमटी हो, जो छोटी-से-छोटी अथवा बड़ी-से-बड़ी बात को भी अत्यंत सावधानी और मजबूती से पकड़कर अथवा सोच-विचारकर सामने रख देती है। Xpassbook.blogspot.com
विशेष – (i) लेखक ने अपने मित्र की बुद्धिमत्ता की प्रशंसा की है, क्योंकि वह अपने विचार बहुत सोच-विचारकर तथा स्पष्ट रूप से व्यक्त करता था।
(ii) भाषा तत्सम-प्रधान, सहज तथा व्यावहारिक है। शैली वर्णनात्मक है।
2. इस भीषण संघर्ष की हूदय-भेदक प्रक्रिया में से गुजरकर उस व्यक्ति का निजत्व कुछ ऐंड़ा-वेंड़ा, कुछ विचित्र अवश्य हो गया था। किंतु सबसे बड़ी बात यह थी कि उसकी बाजू सही थी। इसलिए वह असामान्य था।
प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ गजानन माधव मुक्तिबोध द्वारा रचित निबंध ‘नए की जन्म कुंडली : एक’ से ली गई हैं। इस निबंध में लेखक ने नए और पुराने मूल्यों की संघर्ष गाथा प्रस्तुत करते हुए पुराने को छोड़ने और नए को पूरी तरह से न अपना सकने पर चिंता व्यक्त की है।
व्याख्या – इन पंक्तियों में लेखक अपने उस मित्र के संबंध में बता रहा है जो अपने सिद्धांतों के कारण तत्कालीन परिस्थितियों से समझौता नहीं करता था। उसकी इस जिद्द के कारण उसके जीवन में अनेक कठिनाइयाँ आई. परंतु वह अपने मार्ग से विचलित नहीं हुआ। इन कठिन परिस्थितियों से जूझते हुए उसे अनेक दुःखद स्थितियों से गुजरना पड़ा था। उसका हृदय विचलित हो जाता था, परंतु वह प्रत्येक संघर्ष का सामना करता रहा। इस कारण उसका व्यक्तित्व कुछ विचित्र तथा अटपटा-सा अवश्य हो गया था। इन सब स्थितियों से भी वह घबराया नहीं था क्योंकि उसमें अभी भी विसंगतियों से टकराने की शक्ति थी। यही कारण था कि वह एक सामान्य व्यक्ति न होकर असामान्य व्यक्ति था।
विशेष – (i) लेखक ने अपने मित्र की परिस्थितियों से जूझने तथा सिद्धांत विरुद्ध समझौते न करने की प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला है।
(ii) भाषा तत्सम-प्रधान, भावपूर्ण तथा शैली विचारात्मक है।
3. चारों ओर चाँदनी की रहस्यमय मधुरता फैली हुई थी। चारों ओर ठंडा एकांत फैला हुआ था। मेरी अजीब मनोस्थिति हो गई। मैं अपने पड़ोसियों की जिंदगियाँ हूँड़ने लगा, अपने परिचितों का जीवन तलाशने लगा। एक अनिच्छित बेचैनी मुझमें फैल गई। हाँ, यह सही है कि जिंदगी और जमाना बदलता जा रहा था।किंतु में परिवर्तन के परिणामों को देखने का आदी था, परिवर्तन की प्रक्रिया को नहीं।
प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ गजानन माधव मुक्तिबोध द्वारा रचित निबंध ‘नए की जन्म कुंडली : एक’ से ली गई हैं। इस निबंध में लेखक ने संयुक्त परिवारों के विघटन, पुराने मानदंडों की उपेक्षा तथा नए मूल्यों को पूर्णरूप से न अपना सकने पर चिंता व्यक्त की है।
व्याख्या – इन पंक्तियों में लेखक अपने मित्र से पिछले बीस वर्षों की सबसे महान घटना संयुक्त परिवारों के विघटन की बात सुनकर स्तब्ध रह जाता है और विचारों में डूब जाता है। उस समय वातावरण में चारों ओर चाँदनी फैली हुई थी। लेखक को इस चाँदनी में एक रहस्यमय मधुरता का अनुभव हो रहा था। उसे हर तरफ एकदम ठंडे एकांत के दर्शन हो रहे थे। लेखक की मानसिक दशा बहुत अजीब-सी हो गई थी। अपने मित्र द्वारा बताए गए संयुक्त परिवारों के विघटन की स्थितियों को वह अपने आस-पास के पड़ोसियों और अपने परिचितों के जीवन ला निरीक्षण करने लगा कि इस पारिवारिक विघटन का उन पर क्या प्रभाव हुआ है। यह सब सोचते-सोचते लेखक एक न चाही हुई बेचैनी महसूस करने लगा। उसे लगा कि यह बिलकुल सही है कि आज लोगों की जिंदगी में बदलाव आ रहा है और वक्त भी बदल रहा है। लेखक इन होने वाले परिवर्तनों के परिणामों को देखने का तो अभ्यस्त था, किंतु वह यह नहीं देख पा रहा था कि यह परिवर्तन हो कैसे रहे हैं। Xpassbook.blogspot.com
विशेष – (i) इन पंक्तियों में लेखक समाज में होने वाले पारिवारिक विघटनों तथा बदलते जीवन-मूल्यों के प्रति अपनी चिंता की करता है।
(ii) भाषा तत्सम-प्रधान, भावपूर्ण तथा सरस है । शैली काव्यात्मक, विचारप्रधान एवं आत्मकथात्मक है।
4. लड़के बाहर राजनीति या साहित्य के मैदान में खेलते, और घर आकर वैसा ही सोचते या करते, जो सोचा या किया जाता रहा। समाज में, बाहर, पूँजी या धन की सत्ता से विद्रोह की बात की गई, लेकिन घर में नहीं। वह शिष्टता और शील के बाहर की बात थी। मतलब यह कि अन्यायपूर्ण व्यवस्था को चुनौती घर में नहीं, घर के बाहर दी गई।
प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ गजानन माधव मुक्तिबोध द्वारा रचित नियंध ‘नए की जन्म कुंडली : एक’ से ली गई हैं। इस निबंध में लेखक ने वर्तमान युग में प्राचीन जीवन मूल्यों के विषटन तथा नवीन जीवन मूल्यों को पूर्णरूप से न अपनाने की संघर्ष गाथा प्रस्तुत की है।
व्याख्या – इन पंक्तियों में लेखक का मित्र लेखक को बता रहा है कि किस प्रकार आजादी के बाद हमारे देश में कथनी और करनी में अंतर आ गया है। ‘नए’ की बातें की तो जाती परंतु पालन ‘पुराने’ का ही हो रहा था। नई पीढ़ी घर से बाहर तो राजनीति और साहित्य के क्षेत्र में नए मूल्यों की चर्चा और वकालत करते हैं, परंतु घर के अंदर वही सब कुछ करते हैं जो परंपरा से उनके घरों में होता रहा है। घर के बाहर तो सामाजिक क्रांति, पूँजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह आदि की बातें की जाती हैं परंतु घर में ऐसी कोई चर्चा नहीं होती है। घर में इस प्रकार की बातें शिष्टता और सदाचार के विपरीत मानी जाती हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जहाँ भी अन्याय हो रहा है उसे चुनौती देने का कार्य घर से बाहर किया जाता है, घर में नहीं। इस प्रकार के दोहरे माप-दंड अपनाए जा रहे हैं।
विशेष – (i) लेखक ने समाज में व्याप्त दोही मानसिक्ता पर व्यंय किया है, जहाँ अपने लिए कुछ्छ और तथा दूससें के लिए कुछ दूसे नियम-कानून होते हैं।
(ii) भाषा सहज, व्यावहारिक, भावपूर्ण तथा शैली विचार प्रधान है।
5. इसलिए पुराने सामंती अवशेष बड़े मजे में हमारे परिवारों में पड़े हुए हैं। पुराने के प्रति और नए के प्रति इस प्रकार एक बहुत भयानक अवसरवादी दृष्टि अपनाई गई है। इसीलिए सिर्फ एक सप्रश्नता है। प्रश्न है, वैज्ञानिक पद्धति का अवलंबन करके उत्तर खोज निकालने की न जल्दी है, न तबीयत है, न कुछ। मैं मध्यवर्गीय शिक्षित परिवारों की बात कर रहा हूँ।
प्रसंग – प्रस्तुत पंक्सियाँ गजानन मानव मुक्तिबोध द्वारा रचित निबंध ‘ नए की जन्म कुंडली : एक’ से ली गई हैं। इस निबंध में लेखक ने नए और पुराने जीवन-मूल्यों के जुड़ने और टूटने के संघर्ष की व्यथा-कथा प्रस्तुत की है।
व्याख्या – इन पंक्तियों में लेखक का सिद्धांतवादी मित्र उसे बताता है कि किस प्रकार अभी भी हम पुरानी परंपराओं से जकड़े हुए हैं। नई पीढ़ी घर से बाहर तो क्रांति की बातें करती है परंतु घर में पुरानी परंपराओं का ही अनुसरण करती है। यही कारण है कि अब भी हमारे परिवार पुराने सामंती रीति-रिवाजों को सहज रूप से अपना रहे हैं । इस प्रकार हम लोग पुराने और नए के प्रति अवसरवादी दृष्टिकोण अपना रहे हैं। जिस अवसर पर जो अच्छा लगता है वैसा ही हम करते हैं। इसलिए इसके साथ एक प्रश्न भी जुड़ जाता है कि हम लोग इस समस्या का वैज्ञानिक रूप से कोई उचित हल नहीं निकालना चाहते क्योंकि न तो ऐसा कुछ करने की हमें जल्दी है और न ही हम ऐसा कुछ करना चाहते हैं। यह सब वह मध्यवर्गीय शिक्षित परिवारों के दृष्टिकोण से कह रहा है।
विशेष – (i) लेखक ने वर्तमान पौढ़ी को अवसरवादी माना है जो अपनी आवश्यकता तथा अवसर के अनुकूल नए या पुराने को अपनाती है।
(ii) भाषा तत्सम प्रधान तथा भावपूर्ण है। शैली विचार प्रधान है।
6. नया जीवन, नए मान-मूल्य, नया इंसाफ़ परिभाषाहीन और निराकार हो गए। वे दृढ़ और नया जीवन, नए व्यापक मानसिक सत्ता के अनुशासन का रूप धारण न कर सके। वे धर्म और दर्शन का स्थान न ले सके।
प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ गजानन माधव मुक्तिबोध द्वारा रचित निबंध ‘ नए की जन्म कुंडली : एक’ से ली गई हैं। इस निबंध में लेखक ने वर्तमान युग में नए को अपनाने के मोह में पुराने को त्यागने तथा नए को पूर्ण रूप से न अपना सकने पर चिंता व्यक्त की है। Xpassbook.blogspot.com
व्याख्या – लेखक का मित्र उसे बताता है कि किस प्रकार आज पुराने को छोड़कर नए को अपनाने के मोह में हम नए को भी पूरी तरह से नहीं अपना पा रहे हैं। हमें यहु भी पता नहीं कि ‘ नया’ है क्या ? यही कारण है कि आज नया जीवन, नए मान-मूल्य तथा नया इंसाफ़ सब कुछ परिभाषाहीन तथा आकार-रहित हो गए हैं। इनका कोई अस्तित्व दिखाई नहीं देता है। ये नए विचार और नई जीवन-पद्धति किसी नए व्यापक मानसिक सत्ता के अनुरूप अनुशासन नहीं दे सके। इन्होंने हमारी धार्मिक एवं दार्शनिक भावनाओं का स्थान भी नहीं लिया।
विशेष – (i) लेखक का विचार है कि हमारे जीवन में इस ‘नए’ का कोई स्थान नहीं है, क्योंकि हूम अभी भी अपनी पुगनी परंपरओं से जुड़े हुए हैं।
(ii) भाषा तत्सम-प्रधान, भावपूर्ण तथा शैली विचार प्रधान है।
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