टार्च बेचने वाले – हरिशंकर परसाई – कवि परिचय
लेखक-परिचय :
जीवन-परिच्चय – हिंदी के सुप्रसिद्ध व्यंग्य लेखक हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त, सन 1922 ई॰ को मध्यप्रदेश के होशंगाबाद ज़िले के जमानी नामक गाँव में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही हुई थी। इन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी विषय में एम० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। कुछ वर्षों तक इन्होंने अध्यापन कार्य किया परंतु बार-बार स्थानांतरणों से तंग आकर अध्यापन कार्य छोड़ लेखन का निर्णय लिया। जबलपुर में रहकर इन्होंने ‘वसुधा’ नामक पत्रिका निकाली। Xpassbook.blogspot.com
आर्थिक कठिनाइयों के कारण इन्हें यह पत्रिका बंद करनी पड़ी। इन्हें सन 1984 में ‘साहित्य अकादमी’ ने इनकी पुस्तक ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ के लिए पुरस्कृत किया। मुंबई में इन्हें 20 हज़ार रुपए के ‘चकल्लस पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग ने इन्हें 21000 का पुरस्कार प्रदान किया। परसाई जी पुरस्कार लेने नहीं गए तो मुख्यमंत्री ने स्वयं इनके घर जबलपुर जाकर इन्हें पुरस्कार प्रदान किया। परसाई जी प्रगतिशील लेखक संघ के प्रधान रहे हैं। उनकी पुस्तक ‘आखिन देखी’ पर्याप्त चच्चित रही है। हिंदी व्यंग्य लेखन को सम्मानित स्थान दिलाने में पसाई जी का महत्वपूर्ण योगदान है। सन 1995 ई० में इनका देहांत हो गया था।
रचनाएँ – परसाई जी का हिंदी व्यंग्य लेखकों में सर्वोच्च स्थान है। इन्होंने ‘सारिका’ में नियमित रूप से ‘तुलसीदास चंदन घिसे’ स्तंभ के अंतर्गत व्यंग्यबाण छोड़े थे। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
कहानियाँ – हँसते हैं, रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे, दो नाक वाले लोग, माटी कहे कुम्हार से।
उपन्यास – रानी नागफनी की कहानी’ तथा ‘तट की खोज’।
निबंध संग्रह – तब की बात और थी, भूत के पांव पीछे, बेइमानी की परत, पगडंडियों का जमाना, सदाचार का ताबीज, शिकायत मुझे भी है, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, विकलांग श्रद्धा का दौर, निठल्ले की डायरी।
भाषा-शैली – हरिशंकर परसाई ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त विभिन्न विसंगतियों पर प्रहार किया है। इसके लिए वे भावानुकूल भाषा-शैली का प्रयोग करने में सिद्धहस्त हैं। ‘टार्च बेचनेवाले’ आलेख में लेखक ने टार्च बेचनेवाले दो मित्रों के माध्यम से स्पष्ट किया है कि किस प्रकार से एक मित्र अपनी चालाकी से टार्च बेचते-बेचते धर्माचार्य बन जाता है। लोगों के अंधविश्वासों पर कटाक्ष किया गया है। भाषा में बोलचाल के शब्दों की अधिकता है, जैसे-टार्च, क्रूरता, हरामखोरी, घायल, बीवी, यार, किस्मत आदि। कहीं-कहीं तत्सम शब्द भी दिखाई देते हैं, जैसे -सर्वग्राही, पुष्ट, संपूर्ण, प्रवचन, भव्य, वैभव। लेखक ने मुख्य रूप से व्यंग्यात्मक वर्णन प्रधान शैली अपनाई है। कहीं-कहीं संवादात्मकता से रोचकता में वृद्धि हुई है, जैसे-मेने कहा, ‘ यार, तू तो बिल्कुल बदल गया।’ उसने गंभीरता से कहा,-्’परिवर्तन जीवन का अनंतक्रम है।’
मैने कहा, ‘साले, फ़िलासफ़ी मत बघार यह बता कि तूने इतनी दौलत कैसे सँभाली?’
उसने पूछा, ‘तुम इन सालों में क्या करते रहे ?’
मेंने कहा, ‘घूम-घूमकर टार्च बेचता रहा।’
लेखक ने मुहावरों का सार्थक प्रयोग किया है तथा शब्द-चित्रों के माध्यम से तथाकथित धर्मांचायों पर भी व्यंग्य किया है जब टार्च बेचनेवाले को धर्माचार्य बनने की प्रेरणा मिलती है-‘एक शाम जब मैं एक शहर की सड़क पर चला जा रहा था, मैने देखा कि पास के मैदान में खूब रोशनी है और एक तरफ मंच सजा है। लाउडस्पीकर लगे हैं। मैदान में हजारों नर-नारी श्रद्धा से झुके बैठे हैं। मंच पर सुंदर रेशमी वस्त्रों से सजे एक भव्य पुरुष बैठे हैं। वे खूब पुष्ट हैं, सँवारी हुई लंबी दाढ़ी है और पीठ पर लहराते लंबे केश।’ यहीं से वह प्रेणा प्राप्त कर उपदेशक बन जाता है। इस प्रकार लेखक की भाषा-सैली रोचकता से परिपूर्ण तथा सामाजिक विकृतियों पर कटाक्ष करने में सक्षम है।
Torch Bechne Wale Class 11 Hindi Summary
‘टार्च बेचने वाले’ हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना है। इसमें लेखक ने टॉर्च बेचने का कार्य करने वाले दो मित्रों, के माध्यम से बताया है कि दोनों में से एक टार्च बेचता हुआ, किस प्रकार संतों की वेशभूषा धारण करके, ऊँचे सिंहासन पर बैठकर, आत्मा के अँधेरे को दूरकरने वाली टार्च बेचना आरंभ कर देता है अर्थात् प्रवचन कर्ता बन जाता है। दूसरा दोस्त उसके लाभप्रद धंधे को देखकर आश्चर्यचकित रह जाता है और उसका धंधा अपना लेता है। इस प्रकार समाज में ठगने-भरमाने का गरिमामय धंधा चलता रहता है। इस रचना में पाखंड पर कड़ा प्रहार है।
लेखक को बहुत दिनो बात चौरहे पर टार्च बेचनेवाला मिलता है। उसकी वेशभूपा बदली हुई थी। उसने लंबा कुरता पहना हुआ था और दाढ़ी बढ़ा रखी थी। लेखक उससे उसकी बदली हुई वेशभूषा के बारे में पूछता है। वह लेखक को बताता है कि अब उसकी आत्मा में टार्च रूपी प्रकाश फैल गया है। उसके आगे ‘सूरजछाप’ रूपी टार्च व्यर्थ है। लेखक को लगता है कि वह दुनिया से तंग आकर संन्यास ले रहा है। वह लेखक से कहता है कि ऐसा कुछ नहीं है एक घटना ने उसका जीवन बदल दिया है। वह लेखक को अपनी कहानी बतानी शुरू करता है। पाँच साल पहले वह और उसका दोस्त निराश बैठे एक-एक सवाल का उत्तर दूँढ़ने में लगे थे, लेकिन सारे प्रयल्न करने के बाद भी यह सवाल जैसा पहले था, वैसा ही उनके सामने खड़ा था। सवाल यह था ‘पैसा कैसे पैदा करें ?’ उसने इस सवाल के हल के लिए अपने दोस्त को उपाय सुझाया। वे दोनों इसी समय अलग-अलग दिशाओं में जाकर अपना भाग्य आजमाएँ और पाँच साल बाद इसी स्थान पर मिलें। दोस्त इसके लिए तैयार नहीं था लेकिन वह अपने तर्क से उसे तैयार कर लेता है।
उसने टार्च बेचने का धंधा शुरू कर दिया। वह अपनी टार्च बेचने के लिए लोगों को चौकाने या मैदान में इकट्ठा करता और उन्हें अंधेरे का डर दिखाता कि सभी जगह बहुत अँधेरा है आदमी भटक जाते हैं। अँधेरे में आदमी घायल भी हो जाते हैं। घर और बाहर दोनों जगह रातों में भयानक अँधेरा होता है। यदि चारों ओर अँधेरा है तो उसे आप लोग ‘सूरजछाप टार्च’ खरीदकर दूर करें। उसके ऐसा कहते ही उसकी ‘सूरजछाप टार्च’ बहुत जल्दी बिक जाती। उसका जीवन आराम से व्यतीत हो रहा था।
पाँच साल बाद वह अपने मित्र से मिलने उसी स्थान पर पहुँचा जहाँ से वे अलग हुए थे। उसका मित्र वहाँ नहीं पहुँचा, उसे लगा कि उसका मित्र या तो उसे भूल गया है या मर गया है। वह उसे दूँढ़ने निकल पड़ा। एक शाम एक स्थान पर एक भव्य पुरुष ऊँचे सिंहासन पर बैठे हुए रहस्यमयी वाणी में भाषण दे रहे थे कि अंधकार ने मनुष्य को चारों ओर से घेर रखा है। मनुष्य इस अंधकार से घबराकर अपने मार्ग से भटक गया है। उसके मन की आँखों की ज्योति क्षीण हो गई है इसीलिए उसकी आत्मा भय और पीड़ा से त्रस्त है। लोग उनकी बातें बड़े ध्यान से सुन रहे थे, लेकिन मुझे हँसी आ रही थी। अंत में उन भव्य पुरुष ने कहा कि तुम लोगों को इस अंधकार से नहीं डरना चाहिए। अंधकार के साथ ही प्रकाश की किरण होती है। जहाँ आत्मा में अंधकार है, वहीं प्रकाश की किरण भी है। वह सब लोगों से उस बुझी हुई ज्योति को जगाने का आहवान करते हैं। उनके बनाए साधना मंदिर में आकर वे भीतर की ज्योति जगाने का प्रयास करें। उसे यह सब सुनकर बहुत हँसी आ रही थी।
वह उस भव्य पुरुष से मिलने के लिए उनकी कार के पास पहुँच गया। उसने भव्य पुरुष को नहीं पहचाना था, लेकिन उन्होंने अपने पुराने मित्र को पहचानकर कार में बैठा लिया और उसे अपना परिचय दिया। उनके बँगले में पहुँचकर और उनका वैभव देखकर वह हैरान हो गया। वह उससे पूछता है कि उसने इतनी सारी दौलत कैसे कमा ली ? क्या वह अब भी टार्च बेचता है ? क्योंकि उसकी बातें उसके टार्च बेचने के ढंग से मिलती हैं। उसके मित्र ने कहा कि वह टार्च नहीं बेचता। वह तो साधु है लेकिन पहला मित्र उसकी बात का विश्वास नहीं करता है। उसे लगता है कि उसकी टार्च अच्छी कंपनी की है क्योंकि वह हज़ारों आदमियों के आगे अंधकार की बातें करता है जिसे दूर करने के लिए आत्मा में प्रकाश की किरण खोजने की बात कहता है। दूसरा मित्र उसे बताता है कि उसकी टार्च की कंपनी तो सदियों पुरानी है, जिसका नाम ‘सनातन’ है। इस टार्च की कोई दुकान नहीं होती है। वह बहुत सूक्ष्म है लेकिन उसका मूल्य बहुत अधिक मिलता है। दो दिन रुक जाओ, वह उसे अपने इस लाभप्रद काम के ढंग सिखा देगा। पहला मित्र दो दिन अपने मित्र के पास रुकता है और अपनी ‘सूरजछाप टार्च’ वाली पेटी फेंक देता है क्योंकि अब उसने भी टार्च बेचनेवाली कंपनी बदल ली है। Xpassbook.blogspot.com
कठिन शब्दों के अर्थ :
व्यर्थ – बेकार
कठोर वचन – अप्रिय बातें
गुप्त – छिपा हुआ, गूढ़
भर-दोपहर – एकदम दोपहर का उजाला
गुरु गंभीर वाणी – विचारों से युक्त गंभीर वाणी
हरामखोरी – मुप्त की खाना
चोट – पीड़ा
हताश – निराश
मुताबिक – अनुसार
प्रवचन – उपदेश
सर्वग्राही – सबको ग्रसित करनेवाला
अंतर – मन हृद्य
स्तब्ध – हैरान
आहववान – न्यौता, बुलावा
वैभव – ऐश्वर्य
बघार – बोलना
पथभ्रष्ट – मार्ग से भटका हुआ
व्रस्त – व्यकुल, परेशान
किजित – कुछ
शाश्वत – सदा समान रूप से रहनेवाली
फिलासफी – दार्शनिकता
सनातन – हमेशा रहनेवाली
टार्च बेचने वाले सप्रसंग व्याख्या
1. मगर यह बताओ कि तुम एकाएक ऐसे कैसे हो गए ? क्या बीवी ने तुम्हें त्याग दिया ? क्या उधार मिलना बंद हो गया ? क्या साहूकारों ने ज्यादा तंग करना शुरू कर दिया ? क्या चोरी के मामले में फँस गए हो ? आखिर बाहर का टार्च भीतर आत्मा में कैसे घुस गया ?
प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘ हरिशंकर परसाई’ द्वारा रचित पाठ ‘टार्च बेचने वाले’ से ली गई हैं। लेखक कई दिनों के बाद सूरज छाप टार्च बेचनेवाले से मिलता है। उस व्यक्ति की वेशभूषा बदली हुई थी। उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे उसने संन्यास ले लिया हो। लेखक टार्च बेचनेवाले से उसकी बदली हुई वेशभूषा का कारण पूछता है।
व्याख्या – इन पंक्तियों में लेखक सूरज छाप टार्च बेचनेवाले व्यक्ति से उसके विषय में सब कुछ जानने के लिए उत्सुक है क्योंकि लेखक को सूरज छाप टार्च बेचनेवाला व्यक्ति चौराहे पर दिखाई नहीं दिया था। एक दिन सूरज छाप टार्च बेचनेवाला व्यक्ति लेखक को बदले हुए रूप में मिलता है उसने लंबा कुरता पहन रखा था और दाढ़ी बढ़ा रखी थी। उसे अब सूरज छाप टार्च बेचना व्यर्थ लगता था क्योंकि अब उसके भीतर की टार्च जल गई थी। लेखक को लगता है कि वह संन्यास ले रहा है।
लेख़क उस आदमी से उसके बदलने का कारण पूछता है कि आत्मा के जागृत होने के पीछे क्या कारण है जो वह अचानक बदल गया है। लोगों के बाहर का अँधेरा टार्च से दूर करते हुए उसके अंदर कैसे जल गई है। लेखक को लगता है कि उसकी पली उसे छोड़ गई है तभी वह आत्मा की बातें कर रहा है या उसको अपने धंधे के लिए उधार मिलना बंद हो गया है क्योंकि उसके पास अधिक पूँजी नहीं थी। वह उधार में टार्च का माल लेता था और शाम को टार्च की बिक्री होने पर उधार चुका देता था।
या तो साहूकारों ने उसे परेशान करना आरंभ कर दिया होगा, उन्होंने टार्च का माल पहले से अधिक महँगा कर दिया होगा, उससे नगद पैसा देकर माल उठाने के लिए कहते होंगे या फिर उसका टार्च बेचने पर मिलने वाला कमीशन कम कर दिया है। कहीं वह चोरी किया हुआ माल तो नहीं बेच रहा था जो किसी झगड़े में पड़ गया हो और आत्मा की बातें करनी शुरू कर दी हों। लेखक को यह समझ नहीं आता कि बाहर का अँधेरा दूर करने वाली टार्च उस बेचनेवाले के अंदर कैसे चली गई ? यदि अंदर चली गई तो कैसे जल उठी ? कैसे उसकी आत्मा जाग गई?
विशेष – (i) लेखक उन व्यक्तियों पर कटाक्ष करता है जो लोगों को अपने वाक्-जाल में उलझाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं।
(ii) भाषा सहज, सरल तथा शैली जिज्ञासामूलक एवं विचार प्रधान है।
2. मैं आज मनुष्य को एक घने अंधकार में देख रहा हूँ। उसके भीतर कुछ बुड़ गया है। यह युग ही अंधकारमय है। यह सर्वग्राही अंधकार संपूर्ण विश्व को अपने उदर में छिपाए है। आज मनुष्य इस अंधकार से घबरा उठा है। वह पथभ्रष्ट हो गया है। आज आत्मा में भी अंधकार है। अंतर की आँखें ज्योतिहीन हो गई हैं। वे उसे भेद नहीं पातीं। मानव-आत्मा अंधकार में घुटती है। मैं देख रहा हूं, मनुष्य की आत्मा भय और पीड़ा से त्रस्त है।
प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ हरिशंकर परसाई द्वारा रचित व्यंग्यलेख ‘टार्च बेचनेवाले’ से ली गई हैं। इस पाठ में लेखक ने पाखंडी उपदेशकों पर कटाक्ष किया है जो भोली-भाली जनता को आत्मा के अंधकार की बातें कहकर अपनी ज्ञान की टार्च बेचना चाहते हैं
व्याख्या – इन पंक्तियों में उस समय का वर्णन किया गया है जब टार्च बेचनेवाला एक मित्र अपने दूसरे मित्र को दूँढ़ने निकलता है तो देखता है कि उसकी टार्च बेचनेवाला मित्र एक ऊँचे सिंहासन पर बैठा लोगों को उपदेश दे रहा है कि वह आज समस्त मानव समाज को अज्ञान के घने अंधकार से घिरा देख रहा है। ऐसा लगता है जैसे आज के मनुष्यों के भीतर कुछ बुझ गया है। यह समस्त युग ही अज्ञान रूपी अंधकार से युक्त हो गया है। यह अज्ञान का अंधकार समस्त संसार को अपने अंदर ले रहा है।
इस कारण मनुष्य इस अज्ञान रूपी अंधकार से घबरा गया है। वह अपने जीवन के सद्मार्ग से भटक गया है। उसकी आत्मा पर भी अज्ञान का अंधकार छा गया है। उसके मन की आँखें प्रकाश से रहित हो गई हैं। इस कारण वह अपनी आत्मा पर छाए हुए अंधकार को दूर नहीं कर पाता। आज मनुष्य की आत्मा इस अज्ञान रूपी अंधकार में घुटकर रह गई है। इसलिए वह टार्च बेचनेवाला व्यक्ति जो संत बन गया है, देख रहा है कि मनुष्य की आत्मा इस अज्ञान रूपी अंधकार के कारण भयभीत और व्याकुल हो रही है।
विशेष – (i) लेखक ने स्पष्ट किया है कि किस प्रकार उपदेशक अपनी वाणी के द्वारा भोले-भाले लोगों को उनकी आत्मा के अंधकार से भयभीत कर उनका लाभ उठाना चाहते हैं।
(ii) भाषा तत्सम प्रधान, भावपूर्ण तथा प्रवाहमयी है। शैली उपदेशात्मक एवं विचारप्रधान है।
3. जहाँ अंधकार है, वहीं प्रकाश है। अंधकार में प्रकाश की किरण है, जैसे प्रकाश में अंधकार की किंचित कालिमा है। प्रकाश भी है। प्रकाश बाहर नहीं है, उसे अंतर में खोजो। अंतर में बुझी उस ज्योति को जगाओ। मैं तुम सबका उस ज्योति को उगाने के लिए आहुवान करता हूँ। मैं तुम्हारे भीतर वही शाश्वत ज्योति को जगाना चाहता हूँ। हमारे ‘साधना मंदिर’ में आकर उस ज्योति को अपने भीतर जगाओ।
प्रसंग – प्रस्तुत गद्यांश ‘हरिशंकर परसाई’ रचित रचना ‘टार्च बेचनेवाले’ से अवतरित किया गया है। इस पाठ में लेखक पाखंडी साधुओं के विषय में बता रहा है कि कैसे वह अपनी बातों से लोगों को भरमाते हैं और ठगते हैं।
व्याख्या – भव्य पुरुष अपने सामने बैठे हज़ारों नर-नारियों को आत्मा का अंधकार दिखाकर उन्हें डराता है कि आज का सारा संसार अंधकार में है। प्रत्येक मनुष्य अंधकार में है। मनुष्य उसकी आत्मा भी उस अंधकार में घुट रही है और दुखी है। मनुष्य के अंदर ज्ञान रूपी ज्योति समाप्त हो गई है, इसलिए वह कुछ देख नहीं सकता है। सिद्ध पुरुष लोगों को अंधकार में डूबा देखकर उन्हें अंधकार से प्रकाश में आने का मार्ग बताता है कि अंधकार के साथ रोशनी भी होती है जैसे रात के बाद सुबह आती है. बुराई के बाद अच्छाई आती है वैसे ही अंधकार के साथ रोशनी है परंतु वह लोगों को दिखाई नही देती है, क्योंकि मनुष्य के अंदर की बुराइयों में अच्छाई दबी रहती है, जिसे जगाने की ज़रूरत होती है।
आत्मा में अज्ञान के अँधेरे के साथ ज्ञान की रोशनी और ज्ञान की रोशनी के साथ अज्ञान का अँधेरा होता है। यह सब समझने की ज़रूत है। आत्मा को अंधकार से मुक्त कराने के लिए बाहर की रोशनी की आवश्यकता नहीं होती है। उसके लिए अपने अंदर में ही ज्ञान की रोशनी को ढूँढ़ना पड़ता है। आत्मा में ही ज्ञान की रोशनी मिल जाती है। उसे जागृत करने के लिए सिद्ध पुरुष लोगों को अपने पास बुलाते हैं अर्थात लोगों की अपनी बातों से अंधकार और प्रकाश में ऐसा उलझा देते हैं कि वहह अपने सोचने की शक्ति खो देते हैं और उनकी बातों में उलझकर अपने अंदर की बुझी हुई ज्योति को जलाने के लिए तैयार हो जाते हैं। वह सिद्ध पुरुष लोगों की आत्मा में साक्षात ज्योति जलाना चाहता है और उनकी आत्मा को अंधकार से प्रकाश में लाकर पुण्य आत्मा बनाना चाहता है। इस कार्य के लिए लोगों को उनके बनाए ‘साधना मंदिर’ में आना होता है, जहाँ जाकर लोग साधना द्वारा प्रकाश में आने का प्रयत्न करता है, जिसका लाभ तथाकथित उपदेशक उठाते हैं।
विशेष – (i) लेखक ने स्पष्ट किया है कि कैसे अपने उपदेशों द्वारा पाखंडी साधु लोगों को भ्रमजाल में उलझाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं।
(ii) भाषा तत्सम प्रधान तथा शैली उपदेशात्मक है।
4. मैंने कहा-‘तुम कुछ भी कहलाओ, बेचते तुम टार्च हो। तुम्हारे और मेरे प्रवचन एक जैसे हैं। चाहे कोई दार्शंनिक बने, संत बने या साधु बने, अगर वह लोगों को अँथेरे का डर दिखाता है, तो जरूर अपनी कंपनी का टार्च बेचना चाहता है। तुम जैसे लोगों के लिए हमेशा ही अंधकार छाया रहता है। बताओ, तुम्हारे जैसे किसी आदमी ने हज़ारों में कभी भी यह कहा है कि आज दुनिया में प्रकाश फैला है, कभी नहीं कहा। क्यों ? इसलिए कि उन्हें अपनी कंपनी का टार्च बेचना है।’ मैं खुद भर-दोपहर में लोगों से कहता हूँ कि अंधकार छाया है। बता किस कंपनी का टार्च बेचता है ?
प्रसंग – प्रस्तुत अवतरण ‘हरिशंकर परसाई’ द्वारा रचित व्यंग्य लेख ‘टार्च बेचनेवाले’ से अवतरित किया गया है। इस पाठ में लेखक ने पाखंडी साधुओं पर कड़ा प्रहार किया है कि टार्च बेचनेवाले भी स्वयं को साधु, संत या दार्शनिक कहलाना पसंद करते हैं क्योंकि उनकी टार्च से लोगों की आत्मा में फैला अंधेरा दूर होता है।
व्याख्या – लेखक इन पंक्तियों में दूसरे दोस्त के माध्यम से पहले दोस्त अर्थात सिद्ध पुरुष के कार्यों की पोल खोलता है। दूसरे दोस्त को लगता है कि उसका दोस्त भी टार्च बेचनेवाला है क्योंकि वह भी लोगों में आत्मा के अँधरे का डर उत्पन्न कर रहा है। उन दोनों की बातें लोगों के सामने एक समान थीं। वह लोगों में रात के अँधेरे का डर पैदा करता है और उसका दोस्त लोगों में आत्मा के अँधेरे का डर पैदा कर रहा था। दूसरा दोस्त उसकी बात मानने से इनकार कर देता है। वह उसे कहता है कि वह अपना नाम कुछ भी बदल ले लेकिन उसका काम टार्च बेचनेवालों जैसा ही है। उन दोनों की बातें एक जैसी हैं। दोनों ही लोगों को अँधेर का डर दिखाकर अपना माल बेचते हैं। दूसरा दोस्त टार्च बेचने वाला कहलाता है और पहला दार्शनिक संत और साधु कहलाता है।
यदि वह भी उसकी तरह संसार में फैले अँधेरे और आत्मा के अँधेरे का डर लोगों को दिखाता है, वह भी अवश्य अपनी ही कंपनी की बनाई टार्च बेचता है, जिसमें लाभ ज्यादा है। इसीलिए वह उसे अपना भेद बता नहीं रहा है। टार्च बेचनेवालों के लिए तो सदा अंधकार फैला रहता है। यदि वह साधु है तो प्रकाश फैलने की बात क्यों नहीं करता ? क्यों लोगों को अँधेरे का डर दिखाता है ? कभी भी उस जैसे आदमी ने यह नहीं कहा कि संसार में प्रकाश फैला हुआ है, डरने की कोई बात नहीं है।
अँधेरा समाप्त हो चुका है। चारों ओर प्रकाश फैला हुआ है। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं कहता, वह इसलिए नहीं कहता क्योंकि उन्हें अपनी कंपनी की टार्च बेचनी होती है। वह स्वयं भी भरी दोपहर में, जब अँधरे का नाममात्र भी निशान नहीं होता, अपनी बातों से लोगों को अँधरे के नाम से इतना डरा देता है कि लोगों को दिन में भी अंधेरा दिखाई देने लगता है और वे टार्च खरीद लेते हैं। वह उससे पूछता है कि वह अंधकार की बातें करके लोगों को किस कंपनी की टार्च बेचता है ?
विशेष – (i) लोगों को अँधेरे का डर दिखाकर मूर्ख बनाया जाता है और उन्हें प्रकाश में लाने के लिए अपना उत्पाद बेचा जाता है।
(ii) भाषा सहज, सरल, प्रवाहमयी तथा शैली संवादात्मक है।
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