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बादल को घिरते देखा है Summary – Class 11 Hindi Antra Chapter 17

बादल को घिरते देखा है – नागार्जुन – कवि परिचय


जीवन-परिचय – आधुनिक हिंदी के महान कवि नागार्जुन का जन्म उनकी ननिहाल सतलखा जिला दरभंगा (बिहार) में सन 1911 में हुआ। उनका पैतृक गाँव तौौनी, जिला मधुबनी था। उनका वास्तविक नाम वैद्यनाथ मिश्र था। उन्होंने अपनी मातृभाषा मैथिली में ‘यात्री’ नाम से लेखन कार्य किया। मैधिली में इनका महत्वपूर्ण कविता-संग्रह ‘चित्रा’ नाम से चर्चित है। नागार्जुन मैथिली और हिंदी के साथ-साथ संस्कृत और बांग्ला में भी काव्य-रचना किया करते थे। Xpassbook.blogspot.com


नागार्जुन की प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय संस्कृत पाठशाला में हुई । उन्होंने उच्च शिक्षा वाराणसी और कोलकाता में संपूर्ण की। वे सन 1936 में श्रीलंका यात्रा पर गए और वहीं पर बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए। 1936-1938 तक वे श्रीलंका में ही रहे । इसके बाद वे स्वदेश वापस लौटकर स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रिय हो गए। इन्हीं आंदोलनों के कारण ही उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा।


नागार्जुन एक सफल पत्रकार एवं कुशल संपादक भी थे। सन 1935 में उन्होंने ‘दीपक’ (हिंदी मासिक) और 1942-43 में ‘विश्वबंधु’ (साप्ताहिक) पत्रिकाओं का संपादन किया। नागार्जुन को अनेक पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया। इनके मैथिली कविता-संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ पर इन्हें ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ प्रदान किया गया। उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार के ‘भारत-भारती’, मध्य प्रदेश सरकार की ओर से ‘मैथिलीशरण गुप्त’ तथा बिहार सरकार के ‘राजेंद्र प्रसाद’ आदि पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया। दिल्ली हिंदी अकादमी ने भी उन्हें ‘शिखर सम्मान’ से पुरस्कृत किया। सन 1998 में महाकवि नागार्जुन का देहावसान हो गया।


रचनाएँ – उनकी प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं-


काव्य-संग्रह – युगधारा, प्यासी पथराई आँखें, सतरंगे पंखों वाली, ‘तालाब की मछलियाँ, हज़ार-हज़ार बाँहों वाली, तुमने कहा था, पुरानी जूतियों का कोरस, आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने, रत्नगर्भा, ऐसे भी हम क्या : ऐसे भी तुम क्या, पका है कटहल, मैं मिलिटरी का बूढ़ा घोड़ा तथा भस्मांकुर (खंडकाव्य) आदि।

उपन्यास – बलचनमा, रतिनाथ की चाची, कुंभीपाक, उग्रतारा, जमनिया का बाबा, वरुण के बेटे आदि।


साहित्यिक विशेषताएँ – आधुनिक हिंदी में नागार्जुन मूलतः जन-भावनाओं के कवि हैं। उनकी रचनाएँ ग्रामीण आंचलों से लेकर विद्वानों के बीच काफ़ी चर्चित रही हैं। उनकी कविताए जनमानस से सीधे जुड़ी हुई हैं तथा आम आदमी की भावनाओं को चित्रित करती हैं। नागार्जुन की रचनाओं में प्रकृति का सौँदर्यपूर्ण वर्णन हुआ है। उन्होंने प्रकृति का उद्दीपन एवं आलंबन का चित्रण स्वाभाविकता के साथ किया है। वे प्रकृति को अनेक कोणों से निहारते हैं तथा उसका चित्रण बड़ी ही सहजता एवं विविधता के साथ करते हैं।



उनकी कविता में धारदार व्यंग्य के नमूने भी देखे जा सकते हैं। राजनीतिक एवं सामाजिक वातावरण उनकी कविता का मूल स्वर है। वे राजनीतिक अपराधीकरण और सामाजिक कुरीतियों पर करारे व्यंग्य करते हैं। आम जनता के हितों के प्रति वे सदैव सचेत रहे हैं तथा इन्हीं हितों और अधिकारों को अपने काव्य में उजागर भी करते हैं। वस्तुत: उनकी कविता में लोक जीवन, प्रकृति और समकालीन राजनीति को अपने की काव्य विषयवस्तु के रूप में चित्रित किया गया है। Xpassbook.blogspot.com


भाषा-शैली – चूँकि नागार्जुन जन-कवि हैं, इसलिए उनकी भाषा में आम बोलचाल की भाषा के शब्दों को स्थान मिला है। उनकी पूर्ववर्ती काष्य रचनाओं में भाषा का बहुत ही सरल एवं सहज रूप मिलता है। उन्होंने छंदबद्ध एवं छंदमुक्त दोनों प्रकार की कविताओं का सृजन किया है। बाद की रचनाओं में उनकी भाषा अधिक गंभीर एवं संस्कृतनिष्ठ है। अतः उनकी काव्य भाषा में एक ओर आम बोलचाल की भाषा की रवानी और सादगी है तो दूसरी ओर संस्कृतनिष्ठ शब्दावली की गंभीरता भी।

वस्तुतः नागार्जुन धरती, आम जनता और श्रम के गीत गाने वाले भावुक एवं संवेदनशील कवि हैं।


Badal Ko Ghirte Dekha Hai Class 11 Hindi Summary

प्रस्तुत कविता नागार्जुन के कविता-संग्रह ‘धुगधारा’ से ली गई है। कवि ने बादलों को हिमालय पर्वत की बर्फ से ढकी चोटियों पर घिरते देखा है। पावस ऋतु में हिमालय की छोटी-बड़ी झीलों में बादलों को बरसते देखा है। वे ऐसे प्रतीत हो रही थीं मानो ओस की बूँदे बरस रही हों। इस कविता में कवि ने विरह में ड़बे चकवा-चकवी का वर्णन करते हुए कहा है प्रभात वेला में उनका प्रणय-कलह भी सुनाई दे रहा है। साथ ही हिमालय की गोद मे उछलते-कूदते मृगों का मनोहरी वर्णन किया है। कस्तूरी हिरणों का वर्णन करते हुए कहा है कि उन्हें कस्तूरी की खोज में इधर-उधर भागते है देखा है तथा बादलों को घिरते हुए भी देखा है। कवित को धनपति कुबेर की अलका नगरी, कालिदास की आकाश गंगा व मेघदूत तो कहीं दिखाई नहीं दिए।


वे तो कवि की कल्पनाएँ थी परंतु हिमालय पर्वत की ऊँची चोटियों को तथा बादलों को गरजते खूब देखा है। अंत में कवि भावुक हो जाता है। कवि कहता है कि हिमालय पर्वत पर देवदार केघने जंगल हैं। वहाँ किन्नर जाति के लोग भोजमन की बनी कुटिया में रहते हैं। कवि ने उन्हें बाँसुरी बजाते देखा है। किन्नर जाति की स्त्रियों ने अपने देशों के रंग-बिरंगे फूलों की वेणी लगाई हुई है। नीलम की माला पहनी हुई है। साथ में मंदिरा पान कर रही हैं। मदिरा के कारण किन्नर जाति की स्त्रियों की आँखें लाल और मदमस्त हैं। इनके साथ कवि ने बादलों को देखा है। अतः ये सब दृश्य कवित ने बादलों के घिरने के साथ ही देखे हैं। कवि ने बादलों के साथ प्रकृति का मनोहारी वर्णन किय है।


बादल को घिरते देखा है सप्रसंग व्याख्या

1. अमल धवल गिरि के शिखरों पर,

बादल को घिरते देखा है।

छोटे-छोटे मोती जैसे

उसके शीतल तुहिन कणों को,

मानसरोवर के उन स्वर्णिम

कमलों पर गिरते देखा है।

बादल को घिरते देखा है। Xpassbook.blogspot.com


शब्दार्थ – अमल – निर्मल। धवल – सफ़ेद। शिखर – चोटी। शीतल – ठंडी। तुहिन कण – ओस की बूँद। स्वर्णिम- सोने जैसी ।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित कविता ‘बादल को घिरते देखा है’ से उद्धृत है। यह कविता कविवर नागार्जुन द्वारा रचित है। इस कविता में कवि ने हिमालय पर्वत की स्वच्छ, निर्मल और बऱ से ढकी सफ़ेद चोटियों पर घिरते बादल का वर्णन किया है।


व्याख्या – कवि कहता है कि मैंने हिमालय पर्वत की स्वच्छ, निर्मल और बर्फ़ की सफ़ेद चादर से ढकी चोटियों पर बादल को घिरते देखा हैं। हिमालय की ऊँची सफ़ेद चोटियों पर बादल से वर्षा ऐसे होती है मानो ओस की बूँदे बरस रही हों, फिर ये ओस की बूँदे मानसरोवर झील में खिले सुंदर कमलों के पत्तों पर गिरती हैं । मैंने बादलों से गिरती ओस की बूँदों को स्वयं देखा है।


विशेष :


कवि ने हिमालय की सफ़ेद चोटियों का वर्णन किया है।

प्राकृतिक वर्णन है।

उपमा अलंकार की शोभा सराहनीय है।

तुकबंदी है।

तत्सम शब्दावली है।

भाषा सरल, सहज एवं प्रभावशाली है।

2. तुंग हिमालय के कंधों पर

छोटी-बड़ी कई झीलें हैं,

उनके श्यामल नील सलिल में

समतल देशों से आ-आकर

पावस की ऊमस से आकुल

तिक्त-मधुर विसतंतु खोजते

हंसों को तिरते देखा है।

बादल को घिरते देखा है।


शब्दार्थ – तुंग – ऊँचा। श्यामल – काला। नील – नीला। सलिल – जल। पावस – वर्षा। तिक्त – कड़वे। मधुर – मीठे। विसतंतु – कमल नाल के भीतर स्थित कोमल रेशे या तंतु। हंस – सफ़ेद पंखोंवाले सुंदर पक्षी।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित ‘बादल को घिरते देखा है’ नामक कविता से अवतरित है। प्रस्तुत कविता कविवर ‘नागार्जुन’ द्वारा रचित है। इन पंक्तियों में कवि ने हिमालय पर्वत में स्थित अनेक झीलों में वैरते हंसों का वर्णन किया है।


व्याख्या – कवि कहता है कि मैने देखा है कि हिमालय पर्वत की ऊँची चोटियों पर अनेक छोटी-बड़ी झीलें हैं। इन झीलों के स्वच्छ एवं निर्मल नीले जल में समतल देशों में रहने वाले पक्षी विचरण करते हैं। जब समतल देशों में वर्षा ऋतु में गर्मी पड़ती है तो उमस पैदा हो जाती है। इसी उमस से बचने के लिए ये पक्षी हिमालय की झीलों की ओर चले जाते हैं ओर साथ ही इन पक्षियों के साथ-साथ स्थानीय हंस पक्षी भी झील में खिले कमलों की नाल में कड़वे एवं मीठे तंतुओं को खाते हैं। कवि एक बार फिर कहता हैं कि मैंने इन पक्षियों के साथ हंसों को भी झीलों में तैरते देखा है। बादलों को भी घिरते देखा है। Xpassbook.blogspot.com


विशेष :


कवि ने हिमालय की झीलों में तैरते पक्षियों का सुंदर वर्णन किया है।

समतल देशों में वर्षा ऋतु में उमस का होना स्वाभाविक है।

रूपक अलंकार का प्रयोग है।

तत्सम शब्दावली है।

चित्रात्मक एवं वर्णनात्मक शैली है।

भाषा सरल, सहज एवं प्रवहमयी है।

3. ॠतु वसंत का सुप्रभात था

मंद-मंद था अनिल बह रहा

बालारुण की मुदु किरणें थीं

अगल-बगल स्वर्णिम शिखर थे

एक-दूसरे से विरहित हो

अलग-अलग रहकर ही जिनको

सारी रात बितानी होती,

निशा काल से चिर-अभिशापित

बेबस उस चकवा-चकई का

बंद हुआ क्रंदन, फिर उनमें

उस महान सरवर के तीरे

शैवालों की हरी दरी पर

प्रणय-कलह छिड़ते देखा है।

बादल को घिरते देखा है।


शब्दार्थ – सुप्रभात – सुंदर सवेरा। अनिल – हवा, वायु। बालारुण – उगता सूर्यं। विरहित – अलग होकर दुखी होना। निशाकाल – रात का समय। चिर-अभिशापित – सदा से ही शापग्रस्त, दुखी। चकवा-चकई – एक प्रकार के नर और मादा पक्षी। क्रंदन – चीख, पीड़ा। शैवाल – काई की जाति की एक घास। सरवर – सरोवर। तीरे – किनारे। प्रणय-कलह – प्यार-भरी छेड़छाड़।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्य-पक्तियाँ हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित’ बादल को घिरते देखा है’ नामक कविता से उद्धृत है। इस कविता के रचयिता कविवर ‘नागार्जुन’ हैं। इन पंक्तियों में कवि ने मानसरोवर में विचरण करते चकवा और चकई पक्षी की विरह-वेदना और प्रेम का वर्णन किया है।


व्याख्या – कवि कहता है कि हिमालय की ऊँची स्वर्णिम चोटियों के बीच मानसरोवर झील है। वसंत ऋतु में उदय होते सूर्य की स्वर्णिम किरणें बर्फ की सफ़ेद चादर से ढकी चोटियों पर पड़ती हैं। मंद-मंद गति से हवा चल रही है। इस सुंदर एवं स्वच्छ वातावरण में चकवा और चकई जो सारी रात अलग-अलग रहते हैं। उन्हें एक-दूसरे से रात-भर अलग-अलग रहने का सदा से अभिशाप है। परंतु सुबह होते ही उन बेबस और व्याकुल चकवा और चकई की विरह-चीखें बंद हो जाती हैं। कवि कहते हैं कि मेने चकवा-चकई को हिमालय स्थित मानसरोवर के किनारे शैवाल की हरी चादर पर प्यार-भरी छेड़छाड़ करते देखा है अर्थात् रात-भर विरह वेदना से उबरकर सुबह जब दोनों मिलते हैं तो वे एक-दूसरे के साथ छेड़छाड़ और प्यार भरी क्रीड़ाएँ करते हैं। Xpassbook.blogspot.com


विशेष :


हिमालय पर्वत में स्थित मानसरोवर झील की वसंत ॠतु का वर्णन स्वाभाविक है।

‘चकवा-चकई’ के संदर्भ में काव्य-रूढ़ि का प्रयोग है।

शैली वर्णनात्मक एवं चित्रात्मक है।

तत्सम और तद्भव शब्दावली है।

‘मंद-मंद’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

‘शैवालों की हरी दरी’ में रूपक अलंकार है।

भाषा सरल, सहज एवं मधुर है।

4. दुर्गम बरफ़ानी घाटी में

शत-सहस्न फुट ऊँचाई पर

अलख नाभि से उठने वाले

निज के ही उन्मादक परिमल-

के पीछे धावित हो-होकर

तरल तरुण कस्तूरी मृग को

अपने पर चिढ़ते देखा है।

बादल को घिरते देखा है।


शब्दार्थ – दुर्गम – जहाँ जाना मुश्किल हो। शत – सौ। सहस्त – हज़ार। उन्मादक – मदमस्त। परिमल – सुगंध। धावित – दौड़कर।

प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित ‘ बादल को घिरते देखा है’ नामक कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता कविवर ‘नागार्जुन’ हैं। इस कविता में कवि ने हिमालय पर्वत पर बादलों के घिरने और बरसने का वर्णन किया है।


व्याख्या – कवि कहता हैं कि हिमालय पर्वत में स्थित सैकड़ों-हज़ारों फुट की ऊँचाई पर गहरी और दुर्गम बर्फीली घाटी में अनेक प्रकार के फूलों की सुगंध-सी बिखरी हुई है। चारों ओर सुगंधमय वातावरण है। मृग जिसके पास स्वयं कस्तुरी की सुगंध होती है वह इस नशीली सुगंध के पीछे-पीछे दौड़ रहा है तथा ऐसा प्रतीत होता है, जैसे बेचैन होकर इसी वातावरण में अपने ही ऊपर चिढ़ रहा हो। यह सारा घटनाक्रम मैंने अपनी आँखों से देखा है।


विशेष :


कवि ने बफ़ीली घाटी का वर्णन किया है।

कस्तूरी मृग की उन्मादकता का चित्रण किया है।

संस्कृतनिष्ठ शब्दावली है।

वर्णनात्मक एवं चित्रात्मक शैली है।

भाषा सरल, सहज एवं मधुर है।

5. कहाँ गया धनपति कुबेर वह

कहाँ गई उसकी वह अलका

नहीं ठिकाना कालिदास के

व्योम-प्रवाही गंगाजल का,

बूँड़ा बहुत परंतु लगा क्या

मेघदूत का पता कहीं पर,

कौन बताए वह छायामय

बरस पड़ा होगा न यहीं पर,

जाने दो, वह कवि-कल्पित था,

मैंने तो भीषण जाड़ों में

नभ-चुंबी कैलाश शीर्ष पर,

महामेघ को झंझानिल से

गरज-गरज भिड़ते देखा है।

बादल को घिरते देखा है। Xpassbook.blogspot.com


शब्दार्थ – कुबेर – धन के देवता। अलका – कुबेर की नगरी। कालिदास – संस्कृत के महान कवि। व्योम – आकाश। नभ-चुंबी – आकाश को चूमती। कैलाश – कैलाश पर्वत। शीर्ष – शिखर।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘ अंतरा’ में संकलित ‘ बादल को घिरते देखा है’ नामक कविता से अवतरित है । प्रस्तुत कविता के रचयिता प्रकृति चित्रण में सिद्धहस्त कवि ‘नागार्जुन’ हैं। इस कविता में कवि ने बादल की भीषणता और भयावहता का वर्णन किया है।


व्याख्या – कवि कहता है कि मँने कालिदास के ‘मेघदूत’ में पढ़ा था कि धन के देवता कुबेर की अलका नगरी हिमालय में स्थित है, परंतु बादलों के बीच में कुबेर और उसकी अलका नगरी कही खो गई है अर्थात घिरते बादलों ने कुबेर और उसकी नगरी को जैसे लुप्त कर दिया है। मेघदूत में कालिदास अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करते हैं कि ऐसा लगता है कि जैसे गंगाजल आकाश में चक्कर काट रहा है। परंतु कवि को बहुत दूँढ़ने पर भी न कुबेर मिला, न उसकी अलका नगरी और मेघदूत भी कहीं छुप गया लगता है। इसका पता कौन बता सकता है। शायद कालिदास के मेष भी यहीं पर बरस गए होंगे। चलो, जाने दो। यह सब तो कवि (कालिदास) की कोरी कल्पना थी। परंतु सत्य तो यह है कि मैंने भीषण शीत ऋखु में आकाश को चूमते कैलाश पर्वत के शिखर पर महान बादलों को आपस में टकरा-टकराकर गरज-गरजकर बरसते देखा है।


विशेष :


कवि ने कैलाश पर्वत पर शीत क्रतु में घनघोर बरसते बादलों में सुंदर चित्रण किया है।

कालिदास के मेघदूत का संदर्भ स्वाभाविक है।

वर्णनात्मक एवं चित्रात्मक शैली है।

तत्सम और तद्भव शब्दावली है।

‘कवि-कल्पित’ में अनुप्रास अलंकार है।

भाषा सरल एवं प्रसंगानुकूल है।

6. शत-शत निझर-निझरणी-कल

मुखरित देवदारु कानन में,

शोणित धवल भोज पत्रों से

छाई हुई कुटी के भीतर,

रंग-बिरंगे और सुगंधित

फूलों से कुंतल को साजे,

इंद्रनील की माला डाले

शंख-सरीखे सुघढ़ गलों में,

कानों में कुवलय लटकाए,

शतदल लाल कमल वेणी में,

रजत-रचित मणि-खचित कलामय

पान पात्र द्राक्षासव पूरित

रखे सामने अपने-अपने

लोहित चंदन की त्रिपदी पर,

नरम निदाग बाल-कस्तूरी

मृगछालों पर पलर्थी मारे

मदिरारुण आँखों वाले उन

उन्मद किन्नर-किन्नरियों की

मृदुल मनोरम अँगुलियों को

वंशी पर फिरते देखा है।

बादल को घिरते देखा है।


शब्दार्थ – शत – सौ, सैकड़ा। निझर – झरना। देवदारु – देवदार के वृक्ष। कानन – जंगल। शोणित – लाल। धवल – सफ़ेद। कुंतल – बालों की चोटी, वेणी। इंद्रनील – नीलम, नीले रंग के कीमती पत्थर। कुवलय – नीलकमल। शतदल – कमल। रजत-रचित – चाँदी से बना हुआ। मणिरचित – मणियों से बना हुआ। पान-पात्र – मदिरा का पात्र, सुराही। द्राक्षासव – अंगूरों की शराब। लोहित – लाल। त्रिपदी तिपाई। निदाग – दागरहित। उन्मद – नशीला। मदिरारुण – शराब पीने से लाल हुई आँखें। किन्नर – देवलोक की एक कलाप्रिय जाति। Xpassbook.blogspot.com


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित ‘ बादल को घिरते देखा है’ नामक कविता से उद्धृत है । प्रस्तुत कविता के रचयिता कविवर ‘नागार्जुन’ हैं। इस कविता में कवि ने घिरते बादलों के विभिन्न चित्र खींचे हैं। हिमालय पर्वत में देवदार के घने जंगलों के बीच रहनेवाली किन्नर जाति के नर-नारियों का भी वर्णन किया गया है। किन्नर जाति देवलोक की एक कलाप्रिय जाति है।


व्याख्या – कवि कहता है कि मैं देखता हूँ कि हिमालय पर्वत में देवदार के अनेक घने जंगल हैं। पर्वत की चोटियों से सौ-सौ छोटे-बड़े झरने देवदार के इन्हीं जंगलों में कल-कल करते बहते रहते हैं। इन जंगलों के बीच ही किन्नर जाति के लोग लाल और सफ़ेद भोज-पत्रों से कुटिया बनाकर रहते हैं। किन्नर जाति की स्त्रियाँ अपने बालों में रंग-बिरंगे एवं सुर्णंधित फूलों को सजाए हुए हैं । उन्होंने अपने सुंदर एवं शंखों के समान सुघड़ गलों में नीलम पत्थर की मालाएँ डाली हुई हैं। कानों में नीलकमल लटका रखे हैं। उन्होंने लाल कमल अपनी चोटी (वेणी) में बाँधे हुए हैं तथा दूसरी ओर किन्नर जाति के नर चाँदी और मणियों द्वारा बने हुए सुरा पात्रों में अंगूरों की शराब के पात्र को लाल चंदन की तिपाई पर रखे हुए हैं। वे बाल कस्तूरी मृगों की मुलायम और गर्म खाल पर पालथी मारकर बैठे हैं। उनकी आँखों में शराब का नशा छाया हुआ है। कवि कहता हैं कि मैंने मदमस्त अँखोंवाले इन किन्नर जाति के नर-नारियों को अपनी कोमल और मनोहर अंगुलियों से बाँसुरी बजाते देखा है। बादलों को घिरते देखा है।


विशेष :


कवि ने किन्नर जाति के सौँदर्य और मादक्ता का वर्णन किया है।

अनुप्रास एवं पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग सराहनीय है।

तत्सम और तद्भव शब्दों का मिश्रण हैं।

शैली वर्णनात्मक एवं चित्रात्मक है।

भाषा सरल, सहज, सुंदर एवं प्रसंगानुकूल है। Xpassbook.blogspot.com

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