नींद उचट जाती है – नरेंद्र शर्मा – कवि परिचय
जीवन-परिचय – कविवर नरेंद्र शर्मा का जन्म 2 फरवरी, 1923 को गाँव जहाँगीरपुर, ज़िला, बुलंदशहर (उ० प्र०)में हुआ था। इनकी माता का नाम श्रीमती गंगादेवी और पिता का नाम पं० पूरनमल शर्मा था। चूँकि इनके घर पर आर्य समाज का प्रभाव था इसलिए इनकी भी आर्य समाज में गहरी आस्था थी। इनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव में हुई। इनके बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए ये इलाहाबाद चले गए। सन 1936 में इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। Xpassbook.blogspot.com
सन 1940 में नरेंद्र शर्मा जी काशी विद्यापीठ में शिक्षक के पद पर नियुक्त हुए। जवाहरलाल नेहरू के सहायक सचिव रहते हुए इन्होंने अनेक स्वतंत्रता आंदोलनों में भाग लिया। इसी कारण इन्हें दो वर्ष तक विभिन्न जेलों में जाना पड़ा। मुंबई की फ़िल्मी दुनिया ने भी नरेंद्र शर्मा को आकर्षित किया। सन 1943 में ये मुंबई फ़िल्मी दुनिया से जुड़ गए। वहाँ इन्होंने अनेक फ़िल्मों के कथानक संवाद और गीत लिखे। सन 1953 में ये आकाशवाणी में ‘विविध भारती’ कार्यक्रम के संचालन के रूप में कार्यरत रहे। साठ वर्ष की उम्र में इन्होंने नौकरी से अवकाश प्राप्त किया। 11 फरवरी. 1989 को इनका स्वर्गवास हो गया।
रचनाएँ – उनकी प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं-
काव्य-संग्रह – प्रभात फेरी, प्रवासी के गीत, पलाश वन, प्रीति-कथा, मिट्टी के फूल, कामिनी, हैंस भाला, रक्तचंदन, कदली वन, प्यासा निर्दर, सुवर्ण, बहुत रात गए, उत्तर-जय आदि।
खंड काव्य-द्रौपदी।
साहित्यिक विशेषताएँ – नेंद्र शर्मा मूलतः गीतकार हैं। उत्तर छायावादी गीतकारों में इनकी अपनी एक विशिष्ट पहचान है। ये प्रगतिवाद से भी खासे प्रभावित थे। इनके काव्य में प्रकृति के अनेक चित्र अंकित हैं। उन्होंने प्रकृति का उद्दीपन एवं आलंबन दोनों रूपों में चित्रण किया है। प्रेम की विरह अभिव्यक्ति और प्रकृति के माधुर्य एवं कोमल रूप को इन्होंने एकांतर रूप में चित्रित किया है। काव्य-यात्रा के अंतिम दौर में ये आध्यात्मिकता एवं दार्शनिकता की ओर मुड़ गए। फ़ल्मी गीतों में भी इन्होंने साहित्यिकता को बनाए रखा है। फ़िल्मी गीतकार के रूप में यही साहित्यिकता इनकी अलग पहचान रखती है। उन्होंने निम्न वर्ग का उत्थान एंव नारी अस्मिता और प्रगति का समर्थन निरंतर अपनी कविताओं में किया है।
भाषा-शैली – नरेंद्र शर्मा की भाषा भावों को अभिव्यक्त करने में पूर्णतः सक्षम है। इनकी भाषा आम आदमी तक सीधी पहुँच रखती है। भाव चाहे जैसा भी है पाठक इनके भाव से सीधे जुड़ जाता है। इनकी कविता में तत्सम, तद्भव, देशज तथा अरबी, फ़ारसी सभी प्रकार के शब्दों का प्रयोग सहजता के साथ हुआ है। इनकी कविता में छंदों का विशेष स्थान है। गीतिका, हरिगीतिका इनके प्रिय छंद रहे हैं। अलंकार इनकी भाषा में सरसता एवं रोचकता पैदा करते हैं। उपमा, रूपक, अन्योक्ति, मानवीकरण और उत्र्रेक्षा आदि अलंकारों का प्रयोग इन्होंने स्वाभाविकता के साथ किया है। लाक्षणिकता और अभिधात्मकता का मिश्रण कविता में रोचकता पैदा करता है। प्रबंध एवं मुक्तक काव्य शैलियों के माध्यम से भावों का संतुलन बनाया गया है। वस्तुत: नेंद्र शर्मा की भाषा सरल, सरस, रोचक, भावानुकूल एवं स्वाभाविक है।
Neend Uchat Jaati Hai Class 11 Hindi Summary
इस कविता के माध्यम से कवि ने व्यक्ति और समाज में व्याप्त निराशा को उजागार किया है। इस कविता में कवि ने ऐसी रात का वर्णन किया है जो समाप्त होने का का नाम ही नहीं लेती। इस लंबी रात में कवि अनेक भयावह सपने देखता है, फलस्वरूप उसकी नींद उचट जाती है। उन्हें चारो ओर अँधेरा दिखाई देता है। वह अनुभव करता है कि अंतर्मन में समाए हुए डर के बजाय बाहर का डर अधिक भयानक है। कवि के अंतर्मन और समाज में व्याप्त अँधेरा खत्म होने का नाम नहीं लेता जिससे उसका मन न केवल दुखी होता है अपितु समाज की समस्याएँ भी उसे बेचैन करती हैं। फलस्वरूप वह रातभर करवटें बदलता रहता है। कवि चाहता है कि जब तक धरती पर रात का अँधेरा व्याप्त है तब तक वह सजीव से निर्जीव बन जाए अर्थात नींद की गोद में जाकर वह सामाजिक अव्यवस्था को भूल जाना चाहता है। वह न केवल अपने विषय में सोचकर परेशान है, बल्कि समाज के दुख एवं पीड़ाएँ उन्हें सोने नहीं दे रहे हैं। Xpassbook.blogspot.com
नींद उचट जाती है सप्रसंग व्याख्या
1. जब-तब नींद उचट जाती है
पर क्या नींद उचट जाने से
रात किसी की कट जाती है ?
देख-देख दु:स्वप्न भयंकर
चाँक-च्चांक उठता है, डरकर;
पर भीतर के दुःस्वप्नों से
अधिक भयावह है तम बाहर !
आती नहीं उषा, बस केवल
आने की आहट आती है !
शब्दार्थ – नींद उचटना – अचानक नींद से जागना। दुस्वप्न – डरावना सपना। भयावह – डरावना। तम – अँधेरा। आहट -हलकी आवाज़। उषा – सुबह, सवेरा। नयन – आँखें।
प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘ अंतरा ‘ में संकलित ‘ नींद उचट जाती है ‘ से अवतरित हैं। इस कविता के रचयिता नरेंद्र शर्मा हैं। कवि ने इस कविता में एक ऐसी लंबी रात का वर्णन किया है जो खत्म होने का नाम नहीं लेती। इस लंबी रात में कवि अनेक भयानक एवं डरावने सपने देखते हैं। फलस्वरूप उनकी नींद खराब हो जाती है। उन्हें चारों ओर, अँधेरा-ही-अँधेरा दिखाई पड़ता है। वे अनुभव करते हैं कि अंतर्मन में समाए हुए डर की बजाय बाहर का डर अधिक भयानक है।
व्याख्या – कवि कहते हैं कि रात में अचानक बुरे और डरावने सपने देखने के कारण मेरी नींद खराब हो जाती है और जब यह नींद खराब हो जाती है तो फिर रात लंबी लगने लगती है तथा रात समाप्त होने का नाम नहीं लेती। नींद उचट जाने के बाद कवि अनुभव करता है कि हदयय में जो डर समाया हुआ है उससे कहीं अधिक डराबना अँधेरा तो बाहर बहुत दूर तक फैला हुआ है। बाहर का अंधेरा हमें अधिक भयभीत करता है। जीवन में सुबह का आगमन नहीं होता है । रात लंबी होती चली जाती है। ऐसा संकेत मिलता है कि सुबह होनेवाली है, परंतु एक बार फिर अँधेरा गहरा होने लगता है। अर्थात् जीवन में सुख की अपेक्षा दुख अधिक गहरा है। ऐसा लगता है कि सुख बस आने ही वाला है, परंतु सदैव दूर चला जाता है।
विशेष :
कवि ने व्यक्ति के जीवन में व्याप्त निराशा का वर्णन किया है।
अँधेरा दुख का प्रतीक है।
देख-रेख, चाँक-चाँक में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
प्रश्नालंकार का भी स्वाभाविक प्रयोग है।
भाषा सरल, सुबोध और प्रसंगानुकूल है।
2. देख अँधेरा नयन दूखते,
दुश्चिंता में प्राण सूखते !
सन्नाटा गहरा हो जाता,
जब-जब श्वान शृगाल भूँकते !
भीत भावना, भोर सुनहली
नयनों के न निकट लाती है ! Xpassbook.blogspot.com
शब्दार्थ – दुश्चिंता – दुख देनेवाली चिंता। श्वान – कुत्ता। शृंगाल – गीदड़, सियार। भीत – डर। भोर – सवेरा। सुनहली – सुंदर। नयन – आँखें।
प्रसंग – प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाढ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित नरेंद्र शर्मा द्वारा रचित कविता ‘नीद उचट जाती है’ से अवतरित है । इस कविता में कवि ने लंबी रात का वर्णन किया है जिसमें कवि को डरावने सपने आते हैं और उनकी नींद खराब हो जाती है। बाहर चारों तरफ़ अँधेरा है। कवि का मानना है कि मन के अंधकार से भयानक बाहर का अंधकार है।
व्याख्या – कवि कहते हैं कि जब में बाहर के डरावने अंधकार को देखता हूँ तो मेरी आँखें दुखने लगती हैं। दुख की चिंता के कारण मेरे प्राण निकलने लगते हैं। अनेक बुरी चिंताएँ मुझे चारों ओर से घेर लेती हैं। बाहर अंधकार में चुप्पी समाई हुई है तथा चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ है। इस गहरे और सुनसान अंधकार में जब कुत्ते और गीदड़ अजीब तरह की डरावनी आवाज़ में भौकने लगते हैं तो यह रात और अधिक भयानक लगने लगती है तथा सुंदर और आशावादी सुबह आँखों के पास तक नहीं आ पाती है अर्थात् सुख के क्षण दूर होते चले जाते हैं तथा इन्हीं सुखी क्षणों की और अधिक प्रतीक्षा करनी पड़ती है ।
विशेष :
कवि बाहर के अंधकार को मन के अंधकार से भी अधिक भयानक मानते हैं।
कुत्तों और गीदड़ों की भयानक आवाज़ें अंधेरी रात को और अधिक भयानक बना देती हैं।
‘जब-जब’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
‘भीत भावना’ में अनुप्रास अलंकार है।
लाक्षणिकता एवं प्रतीकात्मकता है।
लय एवम् गेयता है।
तत्सम एवं तद्भव शब्दों का मिश्रण है।
भाषा सरल, सुबोध एंव प्रसंगनुकूल है।
3. मन होता है फिर सो जाऊँ,
गहरी निद्रा में खो जाऊँ;
जब तक रात रहे धरती पर,
चेतन से फिर जड़ हो जाऊँ !
उस करवट अकुलाहट थी, पर
नींद न इस करवट आती है ! Xpassbook.blogspot.com
शब्दार्थ – निद्रा – नींद। चेतन – सजीव, जानदार। जड़ – निर्जीव, बेजान। अकुलाहट – बेचैनी, व्याकुलता।
प्रसंग – प्रस्तुत काव्यांश की पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित कविता ‘ नींद उचट जाती है ‘ से अवतरित है । इस कविता के रचयिता नरेंद्र शर्मा हैं। रात के समय जब कवि की नींद खराब हो जाती है तो वे अपने दुखों के साथ-साथ बाहरी सामाजिक अव्यवस्थाओं के अँधेंेे के कारण और अधिक बेचैन हो जाते हैं।
व्याख्या – नांद उचट जाने के कारण रातभर ठीक से नहीं सो पाते। सामाजिक व्यवस्थाओं और कुरीतियों के बारे में सोचकर वे फिर सो जाना चाहते हैं। उनका मन चाहता है कि मुझे एक बार भी गहरी नींद अपनी आगोश में भर ले। वे चाहते हैं कि जब तक धरती पर रात का अँधेरा व्याप्त है तब तक में सजीव से एक बार में निर्जीव बन जाऊँ अर्थात नींद की गोद में जाकर मैं इस अव्यवस्था को भूल जाना चाहता हूँ। जिस करवट वे लेटे हुए थे उस करवट उन्हें बेचैनी थी, परंतु दूसरी करवट बदलने पर भी बेचैनी उनका पीछा नहीं छोड़ती अर्थात किसी भी करवट नीद नहीं आ रही है। अर्थात वे न केवल अपने बारे में सोचकर परेशान हैं, बल्कि समाज के दुख एवं पीड़ाएँ भी उन्हें सोने नहीं दे रही हैं।
विशेष :
सामाजिक व्यवस्था के कारण कवि के अंतर्मन में बेचैनी है।
तत्सम एवं तद्भव शब्दों का मिश्रण है।
गेय एवं लयात्मकता है।
भाषा सरल, सुबोध एवं प्रवाहमयी है।
4. करवट नहीं बदलता है तम,
मन उतावलेपन में अक्षम !
जगते अपलक नयन बावले,
थिर न पुतलियाँ, निमिष गए थम !
साँस आस में अटकी, मन को
आस रात भर भटकाती है !
शब्दार्थ तम – अँधेरो। उतावले पन – जल्दबाज़ी। अक्षम – असमर्थ। नयन – आँखें। बावले – भोलापन। अपलक – बिना झपके। थिर – स्थिर। निमिष – पल, क्षण। थम – रुकना। आस – आश।।
प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित ‘ नींद उचट जाती है’ नामक कविता से उद्धृत है। इस कविता के रचयिता कविवर नरेंद्र शर्मा हैं। रात के समय अचानक कवि की नींद खराब हो जाती है। फलस्वरूप वे रातभर सो नहीं पाते। Xpassbook.blogspot.com
व्याख्या – कवि बेचैनी के कारण सारी रात करवटें बदलते रहते हैं। वे कहते हैं कि मेरा बार-बार करवेें बदलना मेरे मन के उतावलेपन को दर्शाता है जिसके कारण मेरा मन इस बेचैनी से पार पाने में सक्षम नहीं है। मैं अपलक जागता रहता हूँ, आँखों में पागलपन-सा छा गया है। मेरी पुतलियाँ स्थिर हो गई हैं और समय भी कुछ र्का-सा प्रतीत हो रहा है। कवि का मानना है कि इस बेचैनी में भी मेरी साँसें इसी आशा में अटकी हैं कि सब ठीक हो जाएगा और यही आशा कवि को रातभर भटकाती है।
विशेष :
कवि आशावादी है कि समय के साथ-साथ व्यवस्था में भी परिवर्तन आएगा।
गेय एवं लयात्मकता है।
तत्सम शब्दों के साथ तद्भव शब्दों का मिश्रण है।
‘साँस-आस’ में अनुप्रास अलंकार है।
भाषा सरल, सरस एवं प्रभावशाली है।
5. जागृति नहीं अनिद्रा मेरी,
नहीं गई भव-निशा अँधेरी !
अंधकार केंद्रित धरती पर,
देती रही ज्योति चकफेरी !
अंतर्नयनों के आगे से
शिला न तम की हट पाती है ! Xpassbook.blogspot.com
शब्दार्थ जागृति – जागरण। अनिद्रा – नींद न आना। भव-निशा – निशा, संसार रूपी भयानक रात। ज्योति – प्रकाश। चकफेरी – चारों ओर चक्कर काटना। अंतर्नयनों – मन की आँखें। शिला – पत्थर । तम – अँधेरा, अंधकार।
प्रसंग – प्रस्तुत काव्योंश हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित कवि नरेंद्र शर्मा द्वारा रचित कविता ‘ नींद उचट जाती है ‘ से अवतरित है। इस कविता में बेचैनी के कारण नींद खराब हो जाती है। वे न केवल मन से दुःखी हैं बल्कि समाज की समस्याएँ भी उन्हें बेचैन कर देती हैं। फलस्वरूप वे रातभर करवटें बदलते हैं।
व्याख्या – रातभर करवटें बदलने के कारण कवि सो नहीं पाते। कवि रातभर जागने को जागरण अथवा जागृति नहीं मानते बल्कि इसे नौंद न आने की समस्या कहते हैं। उनका मानना है कि अभी मेरी सांसारिक दुखी जीवन रूपी रात समाप्त नहीं हुई है। संपूर्ण धरती पर अंधेरा व्याप्त है। यहाँ चारों ओर प्रकाश चक्कर लगाता रहता है क्योंकि मेरी आँखों के सामने अँधेरे की चट्टान जमी हुई है। इसलिए मेंरे अंतर्मन और समाज का अंधकार अभी समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा है।
विशेष :
कवि सांसारिक जीवन रूपी रात के अंधकार के कारण बेचैन है।
तत्सम शब्दों की भरमार है।
लय और गेयता विद्यमान है।
लाक्षणिकता का प्रयोग दर्शनीय है।
भाषा सरल, सुबोध एवं सरस है। Xpassbook.blogspot.com
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