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संध्या के बाद Summary – Class 11 Hindi Antra Chapter 14

संध्या के बाद – सुमित्रानंदन पंत – कवि परिचय


जीवन-परिचय – हिंदी के महान कवि सुमित्रानंदन पंत का जन्म उत्तराखंड प्रदेश के अल्मोड़ा जिले में स्थित ‘कौसानी’ नामक गाँव में 1900 में हुआ। जन्म के कुछ घंटों के पश्चात ही इनकी माँ का देहांत हो गया था। इनका बचपन प्रकृति की गोद में ही बीता। इनकी प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा में तथा उच्च शिक्षा बनारस और इलाहाबाद में हुई। पंत गांधीवादी विचारधारा से अत्यंत प्रभावित थे। भारत की स्वतंत्रता-प्राप्ति में पंत ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐसा माना जाता है कि पंत जी ने काव्य-रचना चौथी कक्षा में ही शुरू कर दी थी परंतु वास्तविक कविकार्य उनके प्रथम काव्य संग्रह ‘पल्लव’ ‘1928’ के प्रकाशन के बाद सामने आया। इनकी कविता में छायावादी कविता की सच्ची तसवीर दिखाई पड़ती है। Xpassbook.blogspot.com


छायावादी कवियों में पंत सबसे अधिक भावुक, संवेदनशील एवं कल्पनाशील कवि माने जाते हैं। उन्होंने प्रग्गतिशील साहित्य चेतना के विकास में भी महत्वपूर्ण कार्य किया। 1938 में उन्होंने ‘रूपाभ’ नामक पत्रिका का प्रकाशन भी आरंभ किया। यह पत्रिका प्रगतिशील काव्य-चेतना को बढ़ावा देती थी। पंत जी के काव्य के अनेक सोपान हैं। इनकी मृत्यु 1977 में हुई।

 

रचनाएँ-वीणा, ग्रंथि, पल्लव, युगांत, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्णकिरण, उतरा, कला और बूढ़ा चाँद और लोकायतन आदि। अपने जीवन काल में पंत अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हुए। उन्हें ‘ लोकायतन’ के लिए ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’, ‘कला और बूढ़ा चाँद’ के लिए ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ और चिदंबरा के लिए ‘भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। Xpassbook.blogspot.com


साहित्यिक विशेषताएँ-सुमित्रानंदन पंत प्रकृति के चितेरे कवि माने जाते हैं। छायावादी काव्य के अंतर्गत उन्होंने प्रकृति और मानवीय साँदर्य के अनेक चित्र खींचे हैं। उनकी रोमानी दृष्टि के कारण प्रकृति और मानवीय साँदर्य में अद्भुत रोमांच पैदा हो गया है। प्रगतिवादी काव्य के अंतर्गत उन्होंने ‘ग्राम्या’, ‘उत्तरा’ और ‘स्वर्ण किरण’ जैसी रचनाओं में सामाजिक अनुभूतियों को व्यक्त किया है। उनकी परवर्ती रचनाओं में कल्पनाशीलता के साथ-साथ यथार्थवादी चित्रण किया गया है। रहस्यानुभूति, मानवतावादी दृष्टिकोण और समाजवादी आदर्श उनके काव्य की अन्य विशेषताएँ हैं। उनकी अंतिम काव्य कृतियों में ‘अरविंद् की दार्शनिक चेतना के भी दर्शन होते हैं।


भाषा-शैली – पंत का संपूर्ण काव्य आधुनिक चेतना का संवाहक है। उनकी काव्य-यात्रा में भाषा के विविध रूप दिखाई पड़ते हैं। पंत की काव्य-भाषा में तत्सम शब्दों की भरमार रही हैं। इसके साथ तद्भव और आंचलिक शब्दों का भी प्रयोग किया गया है। खड़ी बोली में व्यंजना शब्द-शक्ति का प्रयोग सहजता के साथ किया गया है। भावों और अनुभूतियों की अभिव्यक्ति में शब्द योजना माधुर्रपपूर्ण है, इसलिए पंत को ‘शब्द शिल्पी’ भी कहा जाता है। अनुप्रास, यमक, उपमा, उत्रेक्षा, रूपक और मानवीकरण अलंकारों का प्रयोग भाषा में सौँदर्य-बोध एवं सरसता पैदा करता है। वस्तुतः उनकी भाषा में भावों की सुंदरता एवं मधुरता अभिव्यंजित होती है।


Sandhya Ke Baad Class 11 Hindi Summary

‘संध्या के बाद’ कविता कवि पंत के काव्य-संग्रह ‘ग्राम्या’ से अवतरित है। यह कवि की प्रगतिवादी विचारधारा से प्रभावित रचना है। इसमें कवि ने ग्रामीण जीवन के विविध सामाजिक यथार्थ का चित्रण किया है। इस कविता में ढलती हुई साँझ के ग्रामीण वातावरण, जनजीवन और प्राकृतिक सुंदरता का चित्रण हुआ है। इसमें वृद्धाओं, विधवाओं, खेत सेघर लौटते किसानों और पशु-पक्षियों का चित्रण भी मिलता है।


कवि ने संध्या समय का चित्रण करते हुए कहा है कि अस्त होते हुए सूर्य की किरणें वृक्ष की चोटियों पर नृत्य करती हैं। पीप्ल के पत्तों से छनकर आनेवाली किरणें ऐसी लगती हैं जैसे ताँबे के पत्तों से सोने के सौ-सौ झरने फूट पड़े हों। प्रकाश और छाया के संयोग से गंगा की जल-धारा साँप की चितकबरी केंचुली के समान लगती है। मंदिरों में शंख औरघंटों की ध्वनियाँ गूँजती हैं। गंगा-तर पर जप करती वृद्धाएँ बगुलों-सी लगती हैं। पक्षियों का स्वर वातावरण में संगीत भर देता है। किसान और व्यापारी थके-हारे निराशा में डूब जाते हैं। Xpassbook.blogspot.com


ग्रामीण समाज का वर्णन करते हुए कवि उनकी इच्छा आशा, निराशा और बेबसी का वर्णन करते हुए यह बताता है कि गाँव में बनिया भी गरीब है तो अन्य के विषय में क्या कहा जाए। ग्रामीण परिवेश में सभी-परिवार अपने-अपनेषौंदों में अलग-अलग विचारधारा के साथ जीवन यापन कर रहे हैं कवि के प्रगतिवादी विचारधारा कहती है कि यदि ग्रामीणों में सामूहिकता की भावना उत्पन्न हो जाए तो ये मिलकर नव-निर्माण करें और समस्त सुख भोगें। समाज को शोषण मुक्त बनाएँ और समाज में प्रत्येक व्यक्ति धन-धान्य से परिपूर्ण हो।


शहरी और ग्रामीण आर्थिक दशा में अंतर को देखकर कवि का मानना है कि व्यक्ति को उसके कर्म और गुण के आधार पर ही आय प्राप्त होनी चाहिए। कविता में कवि ने जन-नेताओं और समाज की चिंता में भाषण देनेवालों पर व्यंग्य करते हुए कहा है कि अवसर मिलने पर वे केवल अपने विषय में ही सोचते हैं। कवि ने समाज की समस्याओं का वर्णन करते हुए उनके समाधान का भी जिक्र किया है। कवि ने निम्न मध्यमयर्गीय लोगों के जीवन के कष्टों का भी उल्लेख किया है। कवि लाला की दयनीय आर्थिक स्थिति का वर्णन करते हुए कहता है कि वह जीवनभर अपनी दुकान की गद्दी पर बैठा हुआ ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह किसी निर्जीव और बेकार अनाज का ढेर हो। पंत की यह कविता प्रकृति तथा सामाजिक व्यवस्था का यथार्थ चित्रण है।


संध्या के बाद सप्रसंग व्याख्या

1. सिमटा पंख साँझ की लाली

जा बैठी अब तरु शिखरों पर

ताप्रपर्ण पीपल से, शतमुख

झरते चंचल स्वर्णिम निई्ईर !

ज्योति स्तंभ-सा धँस सरिता में

सूर्य क्षितिज पर होता ओझल,

बृहद् जिद्य विश्नथ केंचुल-सा

लगता चितकबरा गंगाजल ! Xpassbook.blogspot.com


शब्दार्थ – तरु – वृक्ष। ताम्रपर्ण – ताँबे के सामान पत्ते। निई्जर – झरना। सरिता – नदी। क्षितिज – जहाँ धरती-आसमान मिलते दिखाई दें। वृहद् – बड़ा, विशाल।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘ अंतरा’ में संकलित कविता ‘संध्या के बाद’ से अवतरित है, जिसके रचयिता छायावादी कवि ‘सुमित्रानंदन पंत’ हैं। इन काव्य पंक्तियों में कवि ने संध्या-समय की प्रकृति के विविध रूप चित्रित किए हैं।

व्याख्या – साँझ का मानवीकरण करते हुए कवि कहता हैं। कि दिन अब ढल गया है और ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे साँझ रूपी चिड़िया अपने पंखों को समेटकर वृक्ष की फुनगी पर जा बैठी है। वृक्षों के पत्तों पर ढलते सूर्य की किरणों के पड़ने के कारण उनका रंग तांबे के समान पीपल के पीले पत्तों-सा हो गया है। सैकड़ों धाराओं में बहते इरने का जल स्वर्णिम किरणों के प्रकाश के कारण सोने जैसा लगने लगा है। दूर क्षितिज में डूबते सूर्य को देखकर ऐसा लगता है मानो एक ज्योति पुंज स्तंभ के समान धरती रूपी नदी में धँस गया हो। बहती हुई गंगा का पानी चितकोबरा साँप की भाँति केंचुली लपेट लंबी-सी जीभ निकालकर बहता प्रतीत हो रहा है।


विशेष :


प्रकृति का सुंदर चित्रण किया गया है।

मानवीकरण और उपमा अलंकार का प्रयोग किया गया है।

तत्सम शब्दों की अधिकता है।

भाषा सरल, सहज, मधुर एवं बोधगम्य है।

2. धूपछाँह के रंग की रेती

अनिल ऊर्मियों से सर्पांकित

नील लहरियों में लोड़ित

पीला जल रजत जलद से बिंबित !

सिकता, सलिल, समीर सदा से

स्नेह पाश में बँधे समुज्ज्वल,

अनिल पिघलकर सलिल, सलिल

ज्यों गति द्रव खो बन गया लवोपल।


शब्दार्थ – अनिल – हवा। रजत – चाँदी। जलद – बादल। सिकता – रेत। सलिल – जल। समीर – हवा।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित कविता ‘संध्या के बाद’ से उद्धृत है। इस कविता के रचयिता हिंदी के कवि सुमित्रानंदन पंत हैं। इन पंक्तियों में कवि ने अस्त होते सूर्य की स्वर्णिम किरणों से निरंतर रंग बदलती प्रकृति का वर्णन किया है। Xpassbook.blogspot.com


व्याख्या कवि कहता है कि जब सूर्य अस्त हो रहा है, तो उसकी स्वर्णिम किरणें गंगा के किनारे दूर तक फैले रेत में धूप-छाँही रंग बना देती हैं। लगातार बहती हवा के कारण रेत में साँपों की आकृति-सी बन गई है। गंगा के नीले जल में लहरें ऐसी प्रतीत हो रही हैं, मानो बादलों की चाँदी के समान परछाई जल में प्रतिबिंबित हो रही है। रेत, जल और मंद-मंद बहती हवा मानो तीनों मोहपाश में बँधकर उज्जल प्रतीत हो रही है। हवा पिघलकर जैसे जल बन गई हो और जल जैसे द्रव्यगुण त्यागकर एकाकार हो गया है।


विशेष :


अस्त होते सूर्य के कारण लगातार परिवर्तित होती प्रकृति के रंगों का वर्णन किया गया है।

तत्सम शब्दों का अधिक प्रयोग किया गया है, यथा अनिल, ऊर्मियों, रजत, जलद, सिकता, सलिल, समीर, सेह, द्रव आदि।

‘सिकता, सलिल, समीर सदा से’ में अनुप्रास की छटा दर्शनीय है।

उपमा और उत्त्रेक्षा अलंकार का भी प्रयोग किया गया है।

भाषा सरल, सुबोध एवं प्रवाहमयी है।

3. शंख घंट बजते मंदिर में

लहरों में होता लय कंपन,

दीपशिखा-सा ज्वलित कलश

नभ में उठकर करता नीराजन !

तट पर बगुलों-सी वृद्धाएँ

विधवाएँ जप ध्यान में मगन,

मंथर धारा में बहता

जिनका अदुश्य, गति अंतर-रोदन !


शब्दार्थ – शिखा – ज्योति, लौ। नभ – आकाश। नीराजन – परमात्मा का नाम जपना। मंथर – धीरे-धीरे।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्य-पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित ‘संध्या के बाद’ नामक कविता से उद्धृत हैं । इन पंक्तियों में कवि ने संध्या समय होने वाले भक्ति गीतों की प्रति ध्वनि से गुंजित वातावरण का वर्णन किया है। Xpassbook.blogspot.com

व्याख्या – कवि कहता है कि साँझ होते ही मंदिरों में शंख और घंटे बजने लगते हैं। संपूर्ण वातावरण में यह ध्वनि ऐसे गूँजती है कि मानो लहरों में लयबद्ध कंपन हो रहा है। दीपों की ज्योति की भाँति मंदिरों के शिखर पर चमकता कलश ऐसा लगता है, मानो वह आकाश में जोर-जोर से ‘निरंजन’ पुकार रहा है। नदी के तट पर बूढ़ी स्त्रियाँ और विधवाएँ ऐसे ध्यानमग्न होकर परमात्मा का नाम जप रही हैं, जैसे बगुले-ध्यानपूर्वक पानी में निहार रहे हों और नदी की धारा में उनकी न दिखने वाली अंतर-पीड़ा जैसे धीरे-धीरे बह रही है।


विशेष :


संध्या समय मंदिर में बजने वाले शंख और घंटियों की प्रति ध्यनि से वातावरण भक्तिपूर्ण हो गया है।

बूढ़ी स्त्रियों और विधवाओं की पीड़ाजन्य स्थिति का कारुणिक वर्णन किया गया है।

‘दीप शिखा-सा’ और ‘बगुला-सी वृद्धाएँ’ में उपमा अलंकार है।

तत्सम शब्दों का प्रयोग किया गया है।

भापा सरल, सहज एवं बोधगम्य है।

4. दूर तमस रेखाओं-सी,

उड़ती पंखों की गति-सी चित्रित

सोन खगों की पाँति

आर्द्र ध्वनि से नीरव नभ करती मुखरित !

स्वर्ण चूर्ण-सी उड़ती गोरज

किरणों की बादल-सी जलकर,

सनन् तीर-सा जाता नभ में

ज्योतित पंखों कंठों का स्वर !


शब्दार्थ : तमस – अँधेरा। खगों – पक्षियों। स्वर्ण – सोना। नभ – आकाश। स्वर – ध्वनि। गोरज – पशु के पैरों से उठी धूल।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘ अंतरा’ में संकलित कविता ‘ संध्या के बाद’ से अवतरित है। इस कविता के रचयिता महाकवि सुमित्रानंदन पंत हैं। इन पंक्तियों में कवि ने सूर्य अस्त होने के बाद के ग्रामीण-परिवेश का वर्णन किया है।


क्याख्या – सूर्य अस्त हो गया है और प्रकृति में दूर अँधेरे की रेखाएँ पंख फैलाते पक्षियों की भौंति चित्रित हो रही हैं। पंक्ति में जाते सोन पक्षियों की द्रवित कर देने वाली ध्वनियाँ आकाश के सन्नाटे को ध्वनित कर रही हैं। चरागाहों से लौटते पशुओं के पैरों से उठी धूल हवा में ऐसे तैर रही है, मानो सोने का चूर्ण है। धूल के कारण संपूर्ण वातावरण जैसे सूर्य की किरणें बादल बन गई हैं। अंधकारमय आकाश में चमकते पक्षियों के पंखों और कंठों की ध्वनि एक सनसनाते तीर की तरह गूँज रही हैं।


विशेष :


साँध्यकालीन ग्रामीण परिवेश का चित्रांकन किया है।

उपमा अलंकार दर्शनीय है।

तत्सम शब्दावली का प्रयोग है।

भाषा सरल, सहज एवं प्रभावशाली है।

5. लौँटे खग, गायें घर लौर्टी

लौटे कृषक श्रांत श्लथ डग धर

छिपे गृहों में म्लान चराचर

छाया भी हो गई अगोचर,

लौट पैंठ से व्यापारी भी

जाते घर, उस पार नाव पर,

ऊँटों, घोड़ों के संग बैठे

खाली बोरों पर, हुक्का भर !


शब्दार्थ : खग – पक्षी। कृषक – किसान। गृह – घर। डग – रास्त।


प्रसंग – प्रस्तुत अवतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित ‘संध्या के बाद’ नामक कविता से अवतरित है। इस कविता के रचयिता छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत हैं। इन पंक्तियों में कवि ने सांध्यकालीन वातावरण में घर लौटते पक्षियों, गायों, किसानों और व्यापारियों का वर्णन किया है। Xpassbook.blogspot.com


व्याख्या – साँध्यकालीन वातावरण का वर्णन करते हुए कवि कहता हैं कि साँझ होते ही पक्षी और गायें अपने घरों को लौट रहे हैं। इनके साथ किसान भी दिनभर मेहनत करने के पश्चात् पगडंडियों पर पैर रखते हुए अपने घरों की ओर जा रहे हैं। अँधेरे में उनके घरों में सजीव और निर्जीव सभी कुछ एकाकार हो गया है और अब तो उनकी छाया भी जैसे कहीं छुप गई है। व्यापारी अपने कारोबार समेटकर नाव के माध्यम से नदी पार कर अपने घरों को लौट रहे हैं। कुछ खानाबदोश अपने ऊँटों और घोड़ों के साथ खाली बोरियों को ही बिस्तर बना उन पर बैठे हुक्का पी रहे हैं।


विशेष :


साँध्यकालीन वातावरण में घर लौटते पक्षियों, गायों, किसानों और व्यापारियों का सजीव चित्रांकन किया गया है।

चित्रात्मक शैली है।

तद्भव और आँचलिक शब्दों का प्रयोग किया गया है।

तुकांत का प्रयोग है।

भाषा सरल, सहज एवं बोधगम्य है।

6. जाड़ों की सूनी द्वाभा में

झूल रही निशि छाया गहरी,

डूब रहे निष्ट्रभ विषाद में

खेत, बाग, गृह, तरु, तट, लहरी !

बिरहा गाते गाड़ी वाले,

भूँक-भूँककर लड़ते कूकर,

हुआँ-हुआँ करते सियार

देते विषण्ण निशि बेला को स्वर!


शब्दार्थ – सूनी – सुनसान। द्वाभा – रोशनी। निशि – रात। विषाद – दुख। गृह – घर। लहरी – लहरें। बिरहा – विरह-गीत। कूकर – कुत्ते। सियार – गीदड़। विषण्ण – भयानक।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘ अंतरा’ में संकलित ‘ संध्या के बाद’ से उद्धृत है। इस कविता के रचयिता महाकवि सुमित्रानंदन पंत हैं। इन पंक्तियों में कवि ने जाड़ों की सुनसान रात के वातावरण को चित्रित किया है ।


व्याख्या – सुनसान रात का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि सार्दियों की सुनसान अँधेरे में रात जैसे झूला झूल रही है। इस सुनसान रात में खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, घर, पेड़, नदी का तर और बहते पानी की लहरियाँ जैसे गहरे दुख में डूबे हुए हैं। सुनसान रात में अपनी मंंज़ल की और जाते हुए गाड़ीवाले बिरहा गा रहे हैं। कुत्ते, भूँक-भूँककर आपस में लड़ रहे हैं। गीदड़ों की ‘हुआँ-हुआँ’ की आवाज़ें भयानक रात का संकेत दे रही हैं अर्थात कुत्ते के भौकने की आवाज़ें और गीदड़ों की ‘हुआँ-हुआ’ की आवाज़ें वातावरण को अधिक भयावह बना रही हैं।


विशेष :


जाड़ों की सुनसान रात्रि का वर्णन किया गया है ।

‘भूँक-भूँककर’ और ‘ हुआँ-हुआँ’ में पुनरक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग सफल हैं।

तत्सम शब्दावली का प्रयोग है।

तद्भव और आंचलिक शब्दों का भी प्रयोग किया गया है।

वर्णनात्मक शैली है।

भाषा में गांभीर्य है।

7. माली की मँड़ई से उठ,

नभ के नीचे नभ-सी धूमाली

मंद पवन में तिरती

नीली रेशम की-सी हलकी जाली!

बत्ती जला दुकानों में

बैठे सब कस्बे के व्यापारी,

मौन मंद आभा में

हिम की ऊँघ रही लंबी अंधियारी !


शब्दार्थ – मड़ई – झोंपड़ी। नभ – आकाश। धूमाली – धुआज जैसी। मंद – धीरे-धीरे। पवन – हवा। हिम – बर्फ़। आभा – रोशनी।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित ‘संध्या के बाद’ नामक कविता से उद्धृत है, जिसके रचयिता छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने ऑधियारी सुबह का वर्णन किया है।


व्याख्या – सूर्य निकलने में अभी समय है। रात अभी बाकी है। ऐसे वातवरण में आसमान में छायी धुंध का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि धुँध ऐसी लगती है, जैसे माली की झोंपड़ी में से निकलकर धुआँ आसमान के नीचे आसमान की भाँति छा गया है। हवा मंद-मंद बह रही है। यह मंद-मंद बहती हलकी धुँध रेशम की जाली के समान प्रतीत हो रही है। सुबह होने वाली है और कस्बे के व्यापारी लोग इसी धुँधलके में ही बत्ती आदि जलाकर अपनी दुकानों पर आकर बैठ गए हैं। सुनसान और हलकी रोशनी में जैसे धुँध और अँधेरा ऊँघ रहा है।


विशेष :


हलकी धुँध का वर्णन किया गया है।

कस्बे के व्यापारियों का स्वाभाविक चित्रण किया गया है।

उपमा और मानवीकरण अलंकार है।

तुकांत का प्रयोग है।

देशज शब्दों का प्रयोग है।

भाषा सरल, सहज एवं सारगार्भित है।

8. धुआँ अधिक देती है

टिन की ढिबरी, कम करती उजियाला,

मन से कढ़ अवसाद श्रांति

आंखों के आगे बुनती जाला !

छोटी-सी बस्ती के भीतर

लेन-देन के थोथे सपने

दीपक के मंडल में मिलकर

मँडराते घिर सुख-दुख अपने !


शब्दार्थ : ढिबरी – दीया, जिसमें कैरोसीन ड्ाला जाता है। अवसाद – पीड़ा, दुख। थोथे – झूठे।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित ‘संध्या के बाद’ नामक कविता से अवतिरत है। इस कविता के रचयिता महाकवि सुमित्रानंदन पंत हैं। इन पंक्तियों में कवि ने व्यापारियों के झूठे सपनों का वर्णन किया है। Xpassbook.blogspot.com


व्याख्या – सुबह होने से पहले ही कस्बे के व्यापारी अपनी दुकानों में टिन की ढिबरी (दीया) जलाकर अपना कारोबार शुरू कर देते हैं। यह दीया धुआँ अधिक देता है और रोशनी कम। उसी प्रकार मन के अंतद्वंद्व के कारण उनके जीवन में दुख और पीड़ा का धुआँ उनकी आँखों में भर जाता है। इस छोटी बस्ती, जिसमें दो-चार ही घर हैं, ये व्यापारी लेन-देन को लेकर झूठे सपने बुनने लगते हैं अर्थात इस बस्ती के गरीब लोगों को लेन-देन में फँसकार अमीर बनना चाहते हैं, परंतु इस दीये की रोशनी में सुख-दुख सदा इनके जीवन में मँडराते रहते हैं।


विशेष :


बस्ती के व्यापारियों के झूठे सपनों का यथार्थवादी वर्णन किया गया है।

प्रतीकात्मकता है।

तुकांत का प्रयोग है।

ढिबरी और थोथे आँचलिक शब्दों का प्रयोग स्वाभाविक है।

भाषा सरल, सहज और प्रसंगानुकूल है।

9. कँप-कंप उठते लौ के संग

कातर उर क्रंदन, मूक निराशा,

क्षीण ज्योति ने चुपके ज्यों

गोपन मन को दे दी हो भाषा !

लीन हो गई क्षण में बस्ती,

मिट्टी खपरे के घर आँगन,

भूल गये लाला अपनी सुधि,

भूल गया सब ब्याज, मूलधन !


शब्दार्थ – लौ – लपट, ज्योतिपुंज। उर – हदय। मूक – चुपचाप, मौन। गोपन – चुप। लाला – बनिया।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित हिंदी के महान कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कविता ‘संध्या के बाद’ से उद्धृत है। इस कविता में कवि ने संध्या के बाद के वातावरण का चित्रण किया है।


व्याख्या – सूर्य अभी उद्य नहीं हुआ है। सुबह के धुँधलके में व्यापारी लोग दीये जलाकर अपनी दुकान खोलकर बैठ गए हैं, परंतु कारोबार ग्रामीण परिवेश के अन्य लोगों की भाँति अधिक विस्तृत नहीं हुआ है। वे अन्य ग्रामीणों के समान सामान्य जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। धन की कमी उन्हे भी है। कवि उनकी कमजोर आर्थिक स्थिति का वर्णन करते हुए कहता है कि वे सभी व्यापारी कहीं न कहीं दुःखी हैं। अपनी दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण उनके हुदय की मूक वेदना और पीड़ा ढिबरी (दीये) की काँपती लौ की भाँति कंपित कर रही हैं। बिबरी (दीये) की कंपित ज्योति में उनके हुदय की छिपी पीड़ा और वेदना अपने आप स्वरित हो रही है। अब सूर्य का प्रकाश धीरे-धीरे संपूर्ण बस्ती को प्रकाशित कर देवा है। ग्रामीण घर और औगन सब कुछ अब दिखाई देने लगे हैं। सुबह के धुंधलके में अपनी दुकान में बैंठे जो लाला ब्याज और मूलधन के चक्कर में पड़ गए थे, परंतु दिन निकलने के साथ ही अपने कारोबार में पुन: खो गए हैं तथा अपनी सामान्य दिनचर्या में लिप्त हो गए हैं।


विशेष :


कवि ने व्यापारी-वर्ग की दयनीय आर्थिक स्थिति का स्वाभाविक वर्णन किया है।

चित्रात्मक शैली है। Xpassbook.blogspot.com

‘कँप-कँंप’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

ग्रामीण परिवेश का स्वाभाविक चित्रण हुआ है।

भाषा सरल, सहज एवं प्रसंगानुकूल है।

10. सकुची-सी परचून किराने की बेरी

लग रहीं ही तुच्छतर,

इस नीरव प्रदोष में आकुल

उमड़ रहा अंतर जग बाहर !

अनुभव करता लाला का मन,

छोटी हस्ती का सस्तापन,

जाग उठा उसमें मानव,

औ’ असफल जीवन का उत्पीड़न !


शब्दार्थ : सकुची-सी – छोटी-सी। तुच्छतर – थोड़ी-सी, कम। नीरव – चुपचाप। अंतर – मन, हुदय। उत्पीड़न – दुख, पीड़ा।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्य-पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक अंतरा में संकलित संध्या के बाद’ ‘नामक कविता से उद्धृत हैं। इस कविता के रचयिता छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत हैं। इस कविता में कवि ने ग्राम्य परिवेश में अपनी छोटी-सी दुकान पर बैठे लाला की दयनीय आर्थिक दशा का वर्णन किया है।


ब्याख्या – लाला की छोटी-सी परचून की दुकान पर थोड़ा-सा सामान है। यह थोड़ा-सा सामान बनिया की आर्थिक विवशता को प्रदर्शित कर रहा है। उसका यह आर्थिक दशा उसके हृदय की पीड़ा को अभिव्यक्त करती है। अपनी छोटी और सस्ती दुकान के कारण लाला का छोटापन दिखाई पड़ रहा है। इसी छोटे और सस्ते व्यापार के कारण उसका मन दुखी है। जब वह अपनी द्यनीय आर्थिक स्थिति के बारे में सोचता है, तो उसके असफल जीवन की पीड़ा संसार के सामने अभिव्यक्त हो जाती है।


विशेष :


कवि ने व्यापारी-वर्ग की आर्थिक बदहाली का वर्णन किया है।

लाला की छोटी-सी परचून की दुकान का स्वाभाविक चित्र खींचा गया है।

भाषा प्रसंगानुकूल एवं प्रभावशाली है।

तत्सम और तद्भव शब्दों का प्रयोग है।

11. दैन्य दुख अपमान ग्लानि

चिर क्षुधित पिपासा, मृत अभिलाषा,

बिना आय की क्लांति बन रही

उसके जीवन की परिभाषा !

जड़ु अनाज के ढेर सदृश ही

वह दिन-भर बैठा गद्दी पर

बात-बात पर झूठ बोलता

कौड़ी-की स्पर्धा में मर-मर !


शब्दार्थ – दैन्य – दयनीय। क्षुधित – भूख। पिपासा – प्यास। मृत – मरी हुई। अभिलाषा – इच्छा। आय – आमदनी, धन। क्लांति – अंधकारमय। सदृश – समान। स्पर्धा – मुकाबला।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ से संकलित ‘संध्या के बाद’ नामक कविता से उद्धृत है। इन पंक्तियों में कवि सुमित्रानंदन पंत ने ग्रामीण परिवेश में स्थित व्यापारी-वर्ग की दयनीय आर्थिक स्थिति का चित्रांकन किया है।


व्याख्या – व्यापारी-वर्ग की दयनीय आर्थिक स्थिति का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि अपनी छोटी एवं संकुचित दुकान को देखकर वह स्वयं को दयनीय, दुखी और अपमानित अनुभव करता है। यह संकुचित आय उसकी भूख और प्यास को खत्म नहीं कर पा रही है। उसकी जीवन की सभी आकांक्षाएं लगभग मृतप्राय हो चुकी हैं। बिना किसी आय के उसका अंधकारमय जीवन उसकी दयनीय आर्थिक स्थिति को प्रदर्शित कर रहा है, वह जीवन-भर अपनी दुकान की गद्दी पर बैठा हुआ ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी निर्जीव और बेकार अनाज का ढेर हो अर्थात उसके जीवन में सजीवता नहीं बची है। वह थोड़ी-सी आय के लिए बात-बात में झूठ बोलता है तथा अपने ही वर्ग के साथ प्रतिस्पर्धा के अपने जीवन को तबाह कर रहा है। Xpassbook.blogspot.com


विशेष :


गाँव के व्यापारी-वर्ग की आर्थिक दुर्दशा का वर्णन किया गया है।

बिना आय के किसी भी वर्ग का जीना दूभर हो जाता है।

तत्सम शब्दावली है-दैन्य, चिर, क्षुधित, पिपासा, सदृश आदि।

भाषा सरल, प्रभावशाली एवं प्रसंगानुकूल है।

12. फिर भी क्या कुटुंब पलता है ?

रहते स्वच्छ सुघर सब परिजन ?

बना पा रहा वह पक्का घर ?

मन में सुख है ? जुटता है धन ?

खिसक गई कंधों से कथड़ी

ठिठुर रहा अब सर्दी से तन,

सोच रहा बस्ती का बनिया

घोर विवशता का निज कारण !


शब्दार्थ कुटुंब – परिवार। सुघर – सुंदर घर। परिजन – परिवार के सदस्य। कथड़ी – चीथड़े, जोड़कर बनाया गया वस्त्र। निज – अपना।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित ‘संध्या के बाद’ नामक कविता से अवतरित है। इस कविता के रचयिता महाकवि सुमित्रानंदन पंत हैं। इस पंक्तियों में कवि ने गाँव में व्यापारी वर्ग की प्रतिस्पर्धा और आर्थिक दुर्दशा का वर्णन किया है।


व्याख्या – कवि कहता है कि लाला जीवनभर झूठ बोलता है। दूसरों का शोषण करता है। परंतु इस झूठ बोलने तथा दूसरों का शोषण करने के बाद भी क्या वह अपने परिवार का पालन-पोषण ठीक ढंग से कर पाता है ? क्या वह और उसका परिवार सुंदर, बड़े तथा स्वच्छ घर में रहे हैं ? क्या दूसरों के साथ बेईमानी करके उसने अपना पक्का घर बना लिया है ? क्या उसे जीवन में सुख की प्राप्ति हुई है ? क्या दूसरों को लूटकर तथा आर्थिक शोषण करके उसने अपना घर धन-धान्य से भर लिया है ? सारा जीवन गद्दी पर बैठ-बैठ अब उसके कंधे कमजोर पड़ गए और सदी में उसका शरीर चीथड़े जोड़कर बचाए गए पतले-कमजोर वस्त्र के कारण ठंड से ठिटुर रहा है। इस ठंड में अपनी दुकान पर बैठा व्यापारी अपने जीवन की इसी मजबूरी के कारणों की तलाश कर रहा है अर्थात् इस दयनीय आर्थिक तंगी में वह स्वयं दोषी होने के कारणों पर विचार कर रहा है।


विशेष :


जीवन-भर दूसरों का शोषण करने के बाद भी व्यापारी अपनी आर्थिक दशा को सुद्ढ़ नहीं कर पाया है। कवि ने इसी संबंध में अनेक प्रश्न उठाए हैं।

प्रश्नालंकार है।

भाषा सरल, सहज एवं प्रवाहमयी है।

तत्सम एवं तद्भव शब्दों का प्रयोग किया गया है ।

13. शहरी बनियों-सा वह भी उठ

क्यों बन जाता नहीं महाजन ?

रोक दिए दिए हैं किसने उसकी

जीवन उन्नति के सब साधन ?

यह क्या संभव नहीं

व्यवस्था में जग की कुछ हो परिवर्तन ?

कर्म और गुण के समान ही

सकल आय-व्यय का हो वितरण ?


शब्दार्थ – महाजन – ब्याज पर ऋण देनेवाला। सकल – संपूर्ण। आय-व्यय – आमदनी और खर्च। वितरण – लेन-देन, बँटवारा।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित ‘संध्या के बाद’ नामक कविता से अवततित है। इस कविता के रचयिता महाकवि सुमित्रानंदन पंत हैं। इन पंक्तियों में कवि ने ग्रामीण व्यापारी-वर्ग की दयनीय आर्थिक दुर्दशा का वर्णन किया है। इसके साथ शहरी क्षेत्र में रहने वाले महाजन वर्ग की सुदृढ़ आर्थिक स्थिति के साथ है। Xpassbook.blogspot.com


व्याख्या – कवि कहता है कि ग्रामीण व्यापारी-वर्ग दूसरों के साथ बेईमानी करने के बाद भी अपनी आर्थिक दशा को सुद्धढ नहीं कर पा रहा है फिर वह शहरी क्षेत्र में रहने वाले व्यापारियों की तरह महाजन क्यों नहीं बन जाता है। कवि का प्रश्न है कि वे कौन हैं तथा वे कौन-से कारण हैं कि वह अपने जीवन में उन्नति नहीं कर पाया। कवि का यह मानना है कि ग्रामीण परिवेश में रहनेवाले व्यापारी-वर्ग की दशा को सुदृढ़ करने के लिए सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन करने चाहिए। उसका मानना है कि देश की संपूर्ण आय का बँटवारा व्यक्ति के कर्म और गुण के आधार पर होना चाहिए।


विशेष :


ग्रामीण और शहरी व्यापारी-वर्ग की आर्थिक व्यवस्था में अंतर का वर्णन किया गया है।

तत्सम और तद्भव शब्दों का प्रयोग है।

प्रश्नालंकार है।

तुकांत का प्रयोग है।

भाषा सरल, सुवोध एवं प्रसंगानुकूल है।

14. घुसे घरौदों में मिद्टी के

अपनी-अपनी सोच रहे जन,

क्या ऐसा कुछ नहीं,

फूँक दे जो सबमें सामूहिक जीवन ?

मिलकर जन निर्माण करे जग,

मिलकर भोग करें जीवन का,

जन विमुक्त हो जन-शोषण से,

हो समाज अधिकारी धन का ?


शब्दार्थ घरौदों – घरों। विमुक्त – स्वतंत्र।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित ‘संध्या के बाद’ नामक कविता से अवतरित है। इस कविता के रचयिता महाकवि सुमित्रानंदन पंत हैं। इस कविता में कवि ग्रामीण परिवेश बसे निर्धन परिवारों की पीड़ाजन्य स्थितियों का वर्णन किया है और उन्हें परस्पर मिल-जुलकर जीवन जीने की सलाह दी है।


व्याख्या – कवि कहता है कि ग्रामीण परिवेश में लगभग सभी परिवार अपने-अपने मिट्टी के घरों में अलग-अलग विचारधारा के साथ जीवन जी रहे हैं। वह कहता है कि आपसी वैमनस्य और विरोधों के बजाए उन्हें सभी मिल-जुलकर सामाजिक जीवन जीना चाहिए अर्थात अलग-अलग वर्गों में न रहकर उन्हें आपसी भाई-चारे के साथ जीवनयापन करना चाहिए। उन्हें मिल-जुलकर सामाजिक सद्भावना के साथ समाज का निर्माण करना चाहिए। तभी वे सुंदर और सरल जीवन का आनंद उठा सकते हैं। समाज को बिल्कुल शोषण मुक्त बनायें और समाज में प्रत्येक व्यक्ति धन-धान्य से परिपूर्ण हो। Xpassbook.blogspot.com


विशेष :


समाज के सभी वर्ग आनंदपूर्ण जीवनयापन करते हुए समाज का नवनिर्माण करें।

‘घुसे घरौदों में अनुप्रास अलंकार है।

‘अपनी-अपनी’ में पुनरक्ति प्रकाश अलंकार है।

तद्भव शब्दावली है।

भाषा सरल, सहज, सुबोध एवम् प्रवाहमयी है।

15. दरिद्रता पापों की जननी,

मिटे जनों के पाप, ताप, भय,

सुंदर हों अधिवास, वसन, तन,

पशु पर फिर मानय की हो जय ?

व्यक्ति नहीं, जग की परिपाटी

दोषी जन के दुःख क्लेश की,

जन का श्रम जन में बँट जाए,

प्रजा सुखी हो देश देश की !


शब्दार्थ – दरिद्रता – गरीबी। जननी – माँ। ताप – दुख। अधिवास – घर। वसन – वस्त। तन – शरीर। परिपाटी – व्यवस्था। क्लेश – लड़ाईझगड़े। श्रम – मेहनत। प्रजा – जनता, आम आदमी।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित ‘ संध्या के बाद’ नामक कविता से अवत्तरित है। इस कविता के रचयिता महाकवि सुमित्रानंदन पंत हैं। इन पंक्तियों में कवि ने समाज के प्रत्येक व्यक्ति के दुखों को समाप्त होने और सुखपूर्वक जीवन की कामना की है।


व्याख्या – कवि कहता है कि गरीबी ही आम व्यक्ति के लिए पापों की माँ है अर्थांत गरीबी ही उन्हें पाप करने के लिए मजबूर करती है। इसलिए समाज से गरीबी पूर्ण रूप से समाप्त होनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति, के पास सुंदर घर, कपड़े और स्वस्थ शरीर हो। समाज में पशुता पर मानवता की विजय हो समाज में व्यक्ति के दुख और आपसी लड़ाई-झगड़ों के लिए केवल व्यक्ति ही दोषी नहीं बल्कि सामाजिक व्यवस्था ही इसके लिए जिम्मेवार है। प्रत्येक व्यक्ति की मेहनत का फल उसे अवश्य प्राप्त होना चाहिए, अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति के पास खाने के लिए भोजन, रहने के लिए सुंदर मकान, पहनने के लिए कपड़े आदि आवश्यक चीजें होनी चाहिए तभी प्रत्येक देश की जनता सुखपूर्वक जीवनयापन कर सकती है।


विशेष :


कवि ने गरीबी को ही समस्याओं की ‘माँ’ माना है।

रोटी, कपड़ा और मकान समाज के प्रत्येक व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताएँ हैं।

‘तुकांत’ का प्रयोग है।

तत्सम और तद्भव शब्दों का प्रयोग है।

प्रश्नालंकार का प्रयोग है।

भाषा सरल, सुबोध एवम् प्रभावशाली है।

16. दूट गया वह स्वज्न वणिक का,

आई जब बुढ़िया बेचारी,

आध-पाव आटा लेने

लो, लाला ने फिर डंडी मारी !

चीख उठा घुघ्यू डालों में

लोगों ने पट दिए द्वार पर,

निगल रहा बस्ती को थीरे,

गाढ़ अलस निद्रा का अजगर !


शब्दार्थ : वणिक – व्यापारी, बनिया। डंडी मारना – कम तोलना। घुण्यू – स्थानीय पक्षी। पट – परदा। द्वार – दरवाज़ा। गाढ़ – अत्यधिक। अलस – आलस्य। निद्रा – नींद।


प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ में संकलित ‘संध्या के बाद’ नामक कविता से उद्धृत है। प्रस्तुत कविता हिंदी के महान कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित है। इस कविता ने ग्रामीण परिवेश, गरीबी और अन्य समस्याओं का चित्रण किया है।


व्याख्या – कवि कहता है कि व्यापारी लाला अपनी दुकान काफ़ी समय बिना ग्राहक के बैठा हुआ सपना बुन रहा था। उसका सपना तब टूटा जब गाँव की एक गरीब बुढ़िया दुकान पर आधा-पाय आटा लेने के लिए आई। उस गरीब बुढ़िया के आधा पाव आटे में भी बनिये ने डंडी मारी अर्थांत उसने आटा कम तोला है। तभी दूर तक फैले पेड़ों की टहनियों पर घुघ्यू नामक पक्षी जोर-जोर से चिल्ला उठा और लोगों ने दिन निकलने के


साथ ही अपने दरवाजों पर परदे ड्डाल दिए हैं। दिन निकल आया है। सूर्य काफ़ी ऊपर चढ़ गया है परंतु फिर भी आलसी लोग सो रहे हैं और कवि कहता है कि आलसी नींद रूपी अजगर धीरे-धीरे संपूर्ण ग्राम्य परिवेश को निगल रहा है अर्थांत अभी भी लोगों ने आलस्य के कारण अपने-अपने काम शुरु नहीं किए हैं। Xpassbook.blogspot.com


विशेष :


कवि ने लाला की कम तोलने की प्रकृति का वर्णन किया है।

आलस्य गरीबी का सबसे बड़ा कारण है।

चित्रात्मक शैली है।

तत्सम और तद्भव शब्दों का प्रयोग है।

‘तुकांत’ का प्रयोग है।

भाषा सरल, सहज, सुवोध, प्रवाहमयी एवं प्रसंगानुकूल है।

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