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दोपहर का भोजन - सप्रसंग व्याख्या - Class 11 Hindi Antra Chapter 2 Summary – Dopahar Ka Bhojan Summary Saprasang Vyakhya

दोपहर का भोजन Summary - Class 11 Hindi Antra Chapter 2 Summary





दोपहर का भोजन - अमरकांत


लेखक-परिचय : -

जीवन-परिचय-प्रेमचंद परंपरा के कहानी लेखकों में अग्रणी अमरकांत का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के भगमलपुर (नगरा) नामक गाँव में 1 जुलाई, सन् 1925 ई० को हुआ था। इनका वास्तविक नाम श्रीराम वर्मा है किंतु हिंदी साहित्य संसार में इन्हें अमरकांत के नाम से जाना जाता है। इनकी प्रारंभिक शिक्षा बलिया में ही हुई थी। सन् 1942 ई० के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लेने के कारण इनकी पढ़ाई में व्यवधान पड़ गया था। बाद में सन् 1948 ई० में इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की थी। आजीविका के लिए उन्होंने पत्रकार का जीवन अपनाया तथा सबसे पहले ‘सैनिक’ साप्ताहिक में उपसंपादक का कार्यभार सँभाला। कुछ समय तक ये लखनक में साक्षरता निकेतन से भी जुड़े रहे। इसके पश्चात् इन्होंने इलाहाबाद में ‘अमृत पत्रिका’, ‘भारत’, ‘कहानी’ तथा ‘मनोरमा’ के संपादकीय विभागों में कार्य किया तथा साथ-साथ कहानियाँ भी लिखते रहे। XPassbook.blogspot.com

रचनाएँ – अमरकांत संपादकीय व्यस्तता के कारण बहुत कम लिखते हैं किंतु उनकी रचनाएँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। हिंदी कहानी जगत में वे सन् 1955 ई० में ‘कहानी’ पत्रिका के विशेषांक में प्रकाशित कहानी ‘डिप्टी कलक्टरी’ से प्रसिद्ध हुए। इनके अब तक प्रकाशित कहानी-संग्रह ‘जिंदगी और जोंक, देश के लोग, मौत का नगर, कुहासा आदि हैं। इन्होंने सूखा पत्ता, पराई ड्ञाल का पंछी, सुखजीवी, बीच की दीवार, काले-उजले दिन आदि उपन्यास भी लिखे थे। 15 फरवरी सन् 2014 ई॰ को इनका निधन हो गया। XPassbook.blogspot.com

भाषा-शैली – अमरकांत की कहानियाँ भारतीय जीवन के अंतरिंरोधों का सजीव चित्रण करती हैं। इनमें निम्न मध्यवर्ग का जीवन अपने यथार्थ रूप में उपस्थित हुआ है। इन्होंने अधिकांश कहानियाँ बोलचाल की सहजज भाषा में लिखी हैं जिनमें कहीं-कहीं तत्सम प्रधान शब्दावली के अतिरिक्त अरबी, फ़ारसी, अंग्रेजी तथा देशज शब्दों का प्रयोग भी मिलता है। जैसे ‘दोपहर का भोजन’ कहानी में – ‘वह मतवाले की तरह उठी और गगरे से लोटा-भर पानी लेकर गट-गट चढ़ा गई।’…. ‘बाहर की गली से गुज़रते हुए खड़-खड़ैया इक्के की आवाज़ आ रही थी और खटोले पर सोए बालक की साँस का खर-खर शब्द सुनाई दे रहा था।’ ….. ‘आधा मिनट सुन्न खड़ी रही’ …… ‘मोहन कटोरे को मुँह में लगाकर सुड़-सुड़ पी रहा था।’….. ‘तदुपरांत एक लोटा पानी लेकर खाने बैठ गई।’ इसके अतिरिक्त इनकी कहानियों में अरबी-फ़ारसी के कस्साब, तमन्ना, फ़ाहिशा, कश, आमदोरफ्त; तत्सम शब्द-अंकुश, आग्रह, चित्र, द्वंद्व, अंक आदि शब्दों का प्रयोग भी हुआ है। मिनट, डिप्टी, कलक्रर, स्टेशन, पैकेट आदि अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्दों का भी लेखक ने भरूू प्रयोग हुआ है। XPassbook.blogspot.com

अमरकांत की कहानियों का शिल्प-विधान वर्णनात्मक है जो पात्रों के संवादों के माध्यम से गति प्राप्त करता है। जैसे ‘दोपहर का भोजन’ कहानी में जब रामचंद्र की थाली में रोटी का केवल एक टुकड़ा शेष रह जाता है, तो सिद्धेश्वरी ने उठाने का उपक्रम करते हुए प्रश्न किया, ‘एक रोटी और लाती हूँ ?’

रामचंद्र हाथ से मना करते हुए हड़बड़ाकर बोल पड़ा, ‘नहीं, नहीं, ज़रा भी नहीं। मेरा पेट पहले ही भर चुका है। मैं तो यह भी छोड़ने वाला हूँ। बस, अब नहीं।’ सिद्धेश्वरी ने जिद्द की-‘अच्छा, आधी ही सही।’

रामचंद्र बिगड़ उठा, ‘अधिक खिलाकर बीमार कर डालने की तबीयत है क्या ?’ इस प्रकार के संवादों से पात्रों का चरित्र उद्घाटित होता है। इसी कहानी के अंत में लेखक का यह कथन ‘सारा घर मक्खियों से भनभन कर रहा था। आँगन की अलंगनी पर एक गंदी साड़ी टँगी थी, जिसमें कई पैबंद लगे हुए थे।’ समस्त वातावरण को सजीवता प्रदान करते हुए निम्न मध्यवर्गीय परिवार की दयनीय दशा का शब्द -चित्र ही उपस्थित कर देता है। इस प्रकार के बिंबविधान में लेखक अत्यंत निपुण है। XPassbook.blogspot.com

वास्तव में अमरकांत की कहानियाँ गहरे दायित्व-बोध के अंतर्गत लिखी गई हैं। इन कहानियों में उन्होंने अपने आस-पास के जीवन में अनुभव किए गए अंतर्विरोधों, विसंगतियों, घटनाओं, स्थितियों, पात्रों आदि को उनकी यथार्थता के साथ उसी रूप में चित्रित किया है

जैसे कि वे थे। यही कारण है कि इन कहानियों की स्थितियाँ, घटनाएँ, विवरण, पात्र आदि सभी सप्राण हैं और कस्बाई वातावरण, देशज शब्दावली, पशु-पक्षियों की क्रियाओं आदि से युक्त हैं। इस कारण इनकी कहानियों में उन समस्त पारिवारिक-सामाजिक संदर्भों की ऐतिहासिकता, समय और परिवेशगत सत्यता प्रत्यक्ष हो उठती है जिसमें आदमी लगातार धूर्व, ओछा, दयनीय, दंभी और मक्कार होता गया है तथा उसके सभी आदर्श, सिद्धांत, नैतिक मूल्य आदि ध्वस्त होते गए हैं। वे सरल, सहज तथा व्यावहारिक भाषा में अपनी कहानी कह जाते हैं, जिससे उसमें रोचकता तथा प्रभावशीलता बनी रहती है।

Dopahar Ka Bhojan Summary Saprasang Vyakhya

‘दोपहर का भोजन’ अमरकांत जी की बहुचर्चित कहानी है, जिसमें उन्होंने निम्न आर्थिक स्थिति के एक परिवार की निर्धनता एवं बेकारी से होनेवाली दुर्शा का मार्मिक चित्रण किया है। सिद्धेश्वरी, मुंशी चंद्रिका प्रसाद की पत्ली तथा रामचंद्र, मोहन एवं प्रमोद की माँ है जो अपनी व्यवहार-कुशलता, त्याग तथा धैर्य से घर को टूटने से बचाए हुए है। घर के सभी सदस्य संवेदनशील हैं और गरीबी के चेहरे से परिचित हैं। गर्मियों की दोपहर में खाना बनाते समय सिद्धेश्वरी भूख से बेहाल है परंतु घर में इतना अनाज नहीं कि वह अपने लिए दो चपातियाँ बना सके। वह पानी पीकर गुज्ञारा करना चाहती है किंतु खाली पेट पानी पीकर कब तक जिया जा सकता है। दूटी खाट पर लेटा उसका नन्हा बेटा कुपोषण का शिकार है। उसकी टाँगों और बाँहों की हड़डियाँ निकल आई हैं तो पेट हाँडी की तरह फूल गया है। वह सोया हुआ है। दोपहर के बारह बज गए हैं। भोजन का समय हो गया है। घर का बड़ा लड़का बीस-इक्कीस वर्षीय रामचंद्र आकर चौकी पर निराश हताश बैठ जाता है। XPassbook.blogspot.com

बड़ी देर तक जब वह हिलता-डुलता नहीं तो माँ हिला-डुलाकर उठाती है। वह प्रेस में प्रूफ़ रीडिंग का काम सीखता है संभवतः उसे पारिश्रमिक अभी नहीं मिलता। वह इंटमीडिएट पास है परंतु नौकरी पाना उसके लिए सपना ही है। सिद्धेश्वरी उसे पानी भरी दाल, थोड़े से चने और दो चपातियाँ खाने को देती है। रामचंद्र भूखा रहते हुए भी पेट भरकर खाने का अभिनय करता है। वह छोटे भाई मोहन के विषय में पूछता है। सिद्धेश्वरी नहीं चाहती है कि मोहन को लेकर वह चिंतित हो। वह उसे झूठमूठ कह देती है कि मोहन किसी मित्र के यहाँ पढ़ने-लिखने गया है। वह यह भी कहती है कि मोहन उसकी बड़ी प्रशंसा करता है ताकि रामचंद्र अपना दु:ख भूलकर कुछ समय के लिए ही सही, प्रसन्न हो ले। XPassbook.blogspot.com

कुछ समय पश्चात् मोहन भोजन करने आता है। उससे हिस्से में भी दो ही चपातियाँ और पानी में डूबी दाल ही आती है। सिद्धेश्वरी उससे कहती है कि रामचंड्र उसकी बहुत प्रशंसा कर रहा था। मोहन को यह सुनकर प्रसन्नता होती है। सिद्धेश्वरी के कहने पर वह थोड़ी-सी दाल और पी लेता है। इस प्रकार मोहन भी आधा-पेट भोजन करके उठ जाता है।

पति मुंशी चंद्रिका प्रसाद भी परेशान एवं निराश हैं। उन्हें भी दो चपातियाँ खाने को मिलती हैं। छः महीने पहले उनकी छटनी ‘किराया नियंत्रण बोई्ड’ से हो चुकी है और आजकल वे भी बेकार हैं। सिद्धेश्वरी उसे भी मनोयोगपूर्वक खाना खिलाती है। मुंशी जी भी जानते हैं कि रसोई में भोजन नहीं है इसलिए सिद्धेश्वरी के कहने पर दो से अधिक चपातियाँ नहीं खाते। वे सिद्धेश्वरी से गुड़ का शर्बत बनवाकर पीते हैं। सिद्धेश्वरी उसे प्रसन्न करने के लिए कहती है कि बड़ा बेटा रामचंद्र तो पिता को देवता समान मानता है और उसे शीप्र ही नौकरी भी मिल जाएगी।

यह सुनकर मुंशी जी प्रसन्न हो जाते हैं और आराम से खाट पर सो जाते हैं मानो उसकी नौकरी छूटी ही न हो। मुंशी जी को खाना खिलाकर जब सिद्धेश्वरी स्वयं खाना खाने बैउती है तो उसके लिए थोड़ी-सी दाल, बची-खुची तरकारी, एक मोटी तथा जली हुई रोटी शेष थी। मुँह में पहला ग्रास डालते ही उसे अपने सोए हुए पुत्र की याद आ जाती है और वह आधी रोटी उसके लिए रख देती है। भोजन करते हुए उसकी आँखों में आँसू भर आते हैं। सारे घर में मक्खियाँ भिनभिना रही थीं और मुंशी जी निश्चिंत होकर ऐसे सो रहे थे मानो छँटनी के बाद उन्हें शाम को काम की तलाश में कही जाना ही न हो। XPassbook.blogspot.com

कठिन शब्दों के अर्थ : -

  1. मतवाले – मदमस्त
  2. जी मे जी आना – सहज होना, आराम अनुभव करना
  3. निह्दारने – देखने
  4. किवाड़ – दरवाज्ञा
  5. बेजान-सा – निर्जीव-सा
  6. ग्रास – निवाला, कौर
  7. बड़का – बड़ा लड़का
  8. गगरा – पीतल का घड़ा
  9. ओसारा – बरामदा
  10. व्यप्रता – बेचैनी
  11. फुर्ती – तेज़ी
  12. पनिमाई – पानीवाली
  13. तारीफ़ – प्रशंसा
  14. उन्माद – पागलपन
  15. बर्राक – ठीक प्रकार के
  16. दृष्टिपात – देखना
  17. हाजमा – पाचन क्रिया
  18. विभाजित – बाँटना
  19. निर्विकार – बिना किसी विकार से
  20. ज्ञायका – स्वाद
  21. दुरुस्त – ठीक, सही
  22. तदुपरांत – उसके बाद

दोपहर का भोजन सप्रसंग व्याख्या

1. “लगभग आधे घंटे तक वहीं उसी तरह पड़े रहने के बाद उसके जी में जी आया। वह बैठ गई, आँखों को मल-मल कर इधर-उधर देखा और फिर उसकी दृष्टि ओसारे में अध-टूटे खटोले पर सोए अपने छछ वर्षीय लड़के प्रमोद पर जम गई। लड़का नंग-धड़ंग पड़ा था। उसके गले तथा छाती की हड्डियाँ साफ़ दिखाई देती थीं। उसके हाथ पैर बासी ककड़ियों की तरह सूखे तथा बेजान पड़े थे और उसका पेट हैंडिया की तरह फूला हुआ था। उसका मुख खुला हुआ था और उसपर अनगिनत मक्खियाँ उड़ रही थीं।”

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ आधुनिक हिंदी कहानी के सशक्त कथाकार अमरकांत द्वारा रचित कहानी ‘दोपहर का भोजन’ से उद्धृत हैं। अमरकांत जी ने प्रस्तुत कहानी में निर्धनता और बेकारी से जूझते हुए एक परिवार का मार्मिक चित्रण किया है।

व्याख्या – प्रस्तुत गद्यांश में सिद्धेश्वरी की मनोदशा का चित्रण करते हुए अमरकांत जी लिखते हैं कि भूखे पेट पानी पीने के कारण उसकी छाती में दर्द उठा और वह पीड़ा से बिलबिलाती हुई लेट गई। आधे घंटे के पश्चात उसकी हालत ठीक हुई और वह उठकर बैठ गई। उसकी आँखों के आगे अँधेरा-सा छा रहा था। उसने आँखों को मला तो उसे दिखाई पड़ा कि टूटी-फूटी खाट पर उसका छह वर्षीय बेटा लेटा था। प्रमोद नंग-धड़ंग लेटा था। उसके शरीर की हड्डियाँ निकल आई थीं। उसके हाथ-पैर कमज्ञोरी के मारे किसी बासी ककड़ी की तरह सिकुड़े हुए प्रतीत होते थे। उसके हाथ-पैर प्रायः निर्जीव से पड़े थे। उसका पेट कुपोषण के कारण फूला हुआ था जो किसी हँडिया की तरह लगता था। बच्चे का मुख खुला हुआ था और उसपर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं।

विशेष – (i) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से मुंशी जी के घर की गरीबी का मार्मिक चित्रण किया गया है।
(ii) भाषा सरल, मुहावरेदार तथा मार्मिक है। शैली वर्णनात्मक है। लड़के के हाथ-पैरों को बासी ककड़ियों से उपमित करना अत्यंत सटीक है। XPassbook.blogspot.com

2. मुंशी जी ने पत्नी की ओर अपराधी के समान तथा रसोई की ओर काफ़ी कनखी से देखा। तत्पश्चात किसी छटे उस्ताद की भाँति बोले, ” रोटी ? रहने दो, पेट काफ़ी भर चुका है। अन्न और नमकीन दोनों चीजों से तबीयत ऊब भी गई है। तुमने व्यर्थ ही कसम धरा दी। खैर, कसम रखने के लिए ले रहा हूँ। गुड़ होगा क्या ?”

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ हिंदी साहित्य के सशक्त कथाकार श्री अमरकांत विरचित कहानी ‘ दोपहर का भोजन ‘ से ली गई हैं। प्रस्तुत कहानी में अमरकांत जी ने निम्न मध्यवर्गीय परिवार का चित्रण किया है, जिसमें घर का मुखिया बेकारी की यंत्रणा से गुज़र रहा है।

व्याख्या – प्रस्तुत गद्यांश में लेखक मुंशी चंद्रिका प्रसाद की मनोदशा का चित्रण करता हुआ लिखता है कि जब सिद्धेश्वरी ने पति चंद्रिका प्रसाद को बड़े लड़के की कसम दिलाकर एक चपाती और खाने के लिए कहा तो मुंशी जी को लगा मानो पत्नी ने कसम दिलाकर कोई बड़ा अपराध कर दिया हो। उन्होंने दबी आँख से रसोई की ओर देखा अर्थांत समझ गए कि रसोई में फालतू चपाती नहीं है। मुंशी जी ने बात बनाते हुए कहा कि अन्न और नमकीन से उनका दिल भर गया है। वास्तव में स्थिति इसके ठीक विपरीत है। मुंशी जी ने कहा कि तुमने बेकार ही मुझे शपथ दिला दी इसलिए शपथ रखने के लिए मैं मीठा खा लेता हूँ। मुंशी जी ने सिद्धेश्वरी से गुड़ का शर्बत बनाने को कहा।

विशेष – (i) प्रस्तुत गद्यांश में मुंशी चंद्रिका प्रसाद के घर की विपन्नता का चित्रण किया गया है। मुंशी जी आधा पेटभर खाकर उठे हैं परंतु पत्नी के आग्रह पर केवल गुड़ की माँग करते हैं। उन्हें पता है कि तीसरी रोटी खाने का अर्थ है किसी का बिलकुल भूखे रहना। घरेलू वातावरण उभरकर सामने आता है। सिद्धेश्वरी और चंद्रिका प्रसाद दोनों ही एक-दूसरे से सच्चाई छिपाने का असफल प्रयास करते हैं।
(ii) कहानी की भाषा सरल बोलचाल की भाषा है। शैली संवादात्मक है। XPassbook.blogspot.com

3. उन्माद की रोगिणी की भांति बड़बड़ाने लगी, “पागल नहीं है, बड़ा होशियार है। उस ज्ञमाने का कोई महात्मा है। मोहन तो उसकी बड़ी इज्जत करता है। आज कह रहा था कि भैया की शहर में बड़ी इज्जत होती है, पढ़ने-लिखनेवालों में बड़ा आदर होता है और बड़का तो छोटे भाइयों पर जान देता है। दुनिया में वह सब कुछ सह सकता है, पर यह नहीं देख सकता कि उसके प्रमोद को कुछ हो जाए।”

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ कहानीकार अमरकांत द्वारा रचित कहानी ‘दोपहर का भोजन’ से ली गई हैं। इसमें लेखक ने एक गरीब परिवार की दयनीय स्थिति का वर्णन किया है जिनके पास पेट भरने तक के लिए अन्न नहीं है, परंतु फिर भी गृहस्वामिनी घर के सभी सदस्यों को किसी-न-किसी प्रकार भोजन करा देती है।

व्याख्या – इन पंक्तियों में लेखक कहता है कि जब सिद्धेश्वरी के पति उससे बड़े पुत्र रामचंद्र के बारे में पूछ्ते हैं तो वह पागलपन के मरीज के समान बड़बड़ाते हुए कहने लगती है कि उसका पुत्र पागल नहीं बहुत समझदार है । वह तो अपने पिछले जन्म में कोई संत-महात्मा रहा होगा। मोहन भी अपने बड़े भाई की बहुत इज्जत करता है तथा आज कह रहा था कि भैया की शहर में बहुत इज्जत होती है क्योंकि पढ़ने-लिखनेवालों में भी उसका बहुत सत्कार होता है। वह बड़े लड़के की विशेषताओं का वर्णन करते हुए कहती है कि बड़ा बेटा भी तो अपने छोटे भाइयों को अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करता है। वह बताती है कि बड़ा बेटा संसार के समस्त कष्ट सहन कर सकता है परंतु यह नहीं सहन कर सकता कि प्रमोद को कुछ हो जाए।

विशेष – (i) इन पंक्तियों में लेखक सिद्धेश्वरी के मुख से उसके बड़े लड़के की विशेषताओं का वर्णन करता है।
(ii) भाषा सहज, सरल तथा पात्रानुकूल है तथा शैली वर्णनात्मक है। XPassbook.blogspot.com

4. सारा घर मक्खियों से भनभन कर रहा था। आँगन की अलगनी पर एक गंदी साड़ी टँगी थी, जिसमें पैबंद लगे हुए थे। दोनों बड़े लड़कों का कहीं पता नहीं था। बाहर की कोठरी में मुंशी जी औधें मुँह होकर निश्चिंतता के साथ सो रहे थे, जैसे डेढ़ महीने पूर्व मकान किराया नियंत्रण विभाग की क्लकी से उनकी छँटनी न हुई हो और शाम को उनको काम की तलाश में कहीं जाना न हो!

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ अमरकांत द्वारा रचित कहानी ‘दोपहर का भोजन’ से ली गई हैं जिसमें लेखक ने एक ऐसे गरीब परिवार की दयनीय स्थिति का वर्णन किया है जिनके पास पेट भरने तक के लिए अन्न नहीं है परंतु फिर भी गृहस्वामिनी घर के सभी सदस्यों को किसी-न-किसी प्रकार भोजन करा देती है।

व्याख्या – इन पंक्तियों में लेखक कहता है कि जब दोपहर का भोजन सब लोग कर लेते हैं तो घर में शांति छा जाती है। सारा घर मक्खियों से भिनभिनाता रहता है। आँगन की अलगनी पर पैबंद लगी गंदी-सी साड़ी टँगी हुई थी। दोनों लड़के घर पर नहीं थे। उनका कुछ पता नहीं था कि कहाँ गए हैं। घर के बाहर की कोठरी में सिद्धेश्वरी के पति मुंशी जी उलटे मुँह लेटकर चिंता मुक्त होकर इस प्रकार सो रहे थे मानो उन्हें डेढ़ महीना पहले मकान किराया नियंत्रण विभाग की क्लर्की से निकाल दिए जाने की कोई चिंता ही न हो तथा शाम को उन्हें कहीं किसी काम की तलाश में जाना ही न हो।

विशेष – (i) इन पंक्तियों में लेखक घर की स्तिति का वर्णन करते हुए बताता है कि सोया हुआ व्यक्ति सब प्रकार की चिंताओं से मुक्त दिखाई देता है।
(ii) भाषा सहज, सरल, चित्रात्मक तथा शैली बिंबात्मक है। XPassbook.blogspot.com

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